Dr. Srimati Tara Singh
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कविता
प्रणव मिश्र'तेजस'
प्रणव मिश्र'तेजस'
खुद को कहते विद्वान बहुत
ज्यों सन्नाटे में गूँज हुई
सति दाह
बेटी सावधान तुम रहना
आहुति दे रिश्तों को पहचाना
हे प्रियतम
उषा आगमन
कुछ तो कहीं हुआ
जग नाम अघोरी लेता था
कुछ तो कहीं हुआ
तत्वमसि
प्रिये
इस बार देखना बाजार
जग नाम अघोरी लेता था
एकत्व
जब विश्व क्रीड़ांगन बनता
कल रात बहुत मैं रोया
ममतामयी माँ
भावों की आँधी धूल भरी
उसका खत आया
तुम होते कौन?
मैं वहाँ से आया
वीर बढ़े चलो
जाने वो कैसी होगी
संन्यासी को पुकार
तुम्हारा उत्तर?
मैं कहाँ से क्यों आया?
ओ वीर
मैं निर्मोही
क्रांदित स्वप्न
वीर उठो
मैं निर्मोही
गोरी का रूप सुहाना लगता है
कहाँ हो?
जो बिना लड़े ही जीत गये
पीड़ा वरदान दो
नीलकण्ठ
माया मुझको नही सोहाती
मुक्ति की आस
मेरा प्रिय निराला जाता
सन्यासी गाओ अमर गीत महान
तेरी आँखों में आज भी एक सवाल है
बूढ़ी आँखों के सपने
मैं कवि नही
थकी थकी शाम
वेदनाएं
दूर जाना चाहता हूँ इस फरेब से
कल स्वप्न में आई
प्रिये
जिसको समझ रहे हीरा मोती
लावारिस वृद्ध
भेदभाव
मंदिर
तुम्हारी दासता मुझको स्वीकार्य नही
जल उठी हृदय में विदग्ध ज्वाला
मन का मन से जो मिलन था
पिंजरबद्ध विहग को स्वतंत्रता की आस थी
शुभप्रभात
अंतिम प्रणय निवेदन मेरा
देखो मुझको डर लगता अब तुम दूर न जाना
आज फिर माँग रही जिंदगी
विरह
अकविता
अहंकार
आकुंठा
मन में गहरा बुखार लिये
वैश्या
श्मशान समर्पित कर देना
मैं पथिक यायावर,क्यों किसको अपना मानूँ मैं?
मैं कविता तुम कविता जग जीवन है कविता
स्वतंत्रता
प्रिये
ये बात आखिर क्या?
व्यथित हूँ प्रश्नों से घिरा मन
सुन सति का दाह घृणित
ये रवि,शशि और विद्युत अभिव्यक्ति न देते
अंतिम प्रहर
जब आघातों पर आघात हुआ करता
वह सत्य आखिर क्या है?
मेरा प्रभु
नीलम हुई चुनिया
प्रकाश के देवता
हो आवा सावन रे
नारी महान
अधिकार सुरक्षित
हर उत्सव के अवसर पर उपयुक्त रचनाएँ
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