Dr. Srimati Tara Singh
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गज़ल
सतीश मापतपुरी
सतीश मापतपुरी
कितना हसीन चाँद
रब का बन्दा ही यहाँ नाकाम है
ज़िन्दगी खुद में ही तो एक जंग का एलान है
मेरी कलम ने तुम्हें , महबूबा बनाया है .
मेरी कलम ने तुम्हें , महबूबा बनाया है .
कहाँ आ गया कारवाँ चलते चलते
सांवला रंग तेरा बेहतरीन लगता है
भूल गए मर्यादा जो , उन्हें हद में लाना होगा .
सदियों से दशहरे में रावण जलाते आये हैं
भूलना मत दीन और ईमान को.
दीपों का त्योहार दिवाली
नारी और धरती
मगर बेवफा तुमको कैसे कहें.
गिला उनको हमसे
मर्ज़ी नहीं तो क्या हुआ
हसीना उसको कहते हैं
ये कैसा शरारा है.
आँखें नम थी मगर मुस्कुराते रहे .
आँख
तेरे अशआर हैं
जिंदगी थक गयी ऐसे हालात से .
हँस दें ज़वाब में
आँखों के धृतराष्ट्र
अवतार हम नहीं
मुख्तार हम नहीं
इन्सान और फ़रिश्ता
तुम्हें बदनाम कर देंगे
हर उत्सव के अवसर पर उपयुक्त रचनाएँ
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