Dr. Srimati Tara Singh
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गज़ल
सुनील मिश्रा "साँझ"
सुनील मिश्रा "साँझ"
तुम्हारे रुख पर जमाल अच्छा है
कौन किसका कहा करता है
रिश्ते
भगवान का दिया कम नहीं है
काॅलेज का नया गप-शप देखो
कुछ अरमाँ मेरे अपनों से रह गये
साकी पियूँगा पूरी शाम भर
आपका हल्का सा इक इशारा बहोत है
ये रास्ते मेरी मंज़िल का पता पूछते हैं
कर भरोशा रास्ता दिखा देगा
लोगों का कैसा रेला चला है
तुमने जैसे समझ लिया वैसा नहीं हूँ मैं
दाग इतनी आसानी से ना जायेगा
उसकी पूरी मनमानी हो गयी
अपनी जेब से पूरा ....बाज़ार लाया !
रोटी से जूझते बच्चा जवान हो गया !
साहिल पे खड़ा हूँ मझधार देखता !
अच्छे दिन
एक ख़ता करके जब देखा मैंने !
कोयल श्रोता बनी, कौवे गाने लगे अबतो !
मैं कैसे उसका एहसान अदा करता !
मुझे अब उबाऊ लगती हैं बातें मेरे शहर की !
प्यार के किस्से पुराने नहीं हुए
जो किसी के दिल तक ना उतरे वो बात कैसी है !
किससे अपने दिल की बताई जाए !
किसी का बुरा, कोई ग़लत काम न कर !
वो जाने लगा तो मैं रोया न था !
कोई बात हो, तो हो हज़ार की !
आज रब को भी मेरा खयाल आ गया !
उन्हीं से उनकी शिकायत कर दी !
अपने आगे कब दूसरे की परवाह होती है !
साकी मेरे दिल का आज हर दर्द निकाल दे !
मैने अब जीतने की ठान रक्खी है !
उसने फिर घर पर बुलाया नाम का !
जफ़ाएँ जवान हूईं !
उनको अपने जख़्म दिखाते रहना !
ऐसे ना देख....... मुझे हैरानियों के साथ !
जो पीछे छूट गया, उसके वास्ते कम चले !!
सावन की फुहारें सबको बहलाने आयीं !
मुझे ही मेरी ग़ज़ल जब सुनाया नक्कालों नें !
बातें करो ये रात निकलेगी !
चल के पैदल ही तेरे साथ सफर कर लेंगे !
हर उत्सव के अवसर पर उपयुक्त रचनाएँ
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