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पंखों की तलाश

 

पंखों की तलाश

रात के दो बजे थे। बाहर सड़कें वीरान हो चुकी थीं। दूर कहीं कुत्तों के भौंकने की आवाज़ माहौल की खामोशी को और गहरा कर रही थी। कमरे में हल्का अंधेरा था, और सिर्फ मोबाइल स्क्रीन की नीली रोशनी रीमा के चेहरे पर पड़ रही थी। व्हाट्सएप पर "लास्ट सीन: 1:57 AM" देखकर उसने गहरी साँस ली। राघव अभी भी दफ्तर में था, शायद किसी बड़ी खबर की तलाश में।

रीमा ने हल्के गुलाबी रंग की साटन की नाइटी पहन रखी थी, जो टखनों तक झूल रही थी। उसकी पतली पट्टियों वाले नाइट सूट का ऊपरी हिस्सा कंधों पर ढीला पड़ रहा था, जिससे उसकी हल्की सिहरन और भी स्पष्ट हो रही थी। ठंडी हवा के स्पर्श से उसने अपने हाथ आपस में मलते हुए खुद को गर्म रखने की कोशिश की। उसके खुले बाल हल्की नमी के कारण उसकी पीठ से चिपक गए थे, और हर कदम पर उसकी नाइटी का मुलायम कपड़ा उसके पैरों से लिपटता जा रहा था।

उसने कांपते हाथों से तस्वीर उठाई— एक वक्त था जब राघव उसे देखता था, अब बस स्क्रीन पर देखता है। पहले उसकी हँसी की परवाह करता था, अब सिर्फ ब्रेकिंग न्यूज़ की। पहले वह उसकी ज़िन्दगी की प्राथमिकता थी, अब वह सिर्फ "राघव की पत्नी" बनकर रह गई थी।

उसके भीतर कुछ दरक गया। उसने तस्वीर को उलटकर रखा और खिड़की के पास जाकर खड़ी हो गई। बाहर रात का सन्नाटा था, लेकिन उसके भीतर एक तूफ़ान उठ रहा था।

रीमा (धीमे स्वर में, खुद से):
"रिश्ते भी वक्त मांगते हैं, राघव... और तुम्हारे पास तो सिर्फ हेडलाइंस के लिए वक्त है।"

उसकी आँखें छलकने को थीं, लेकिन उसने खुद को रोने से रोक लिया। उसके गालों पर हलकी सी नमी महसूस हो रही थी, जैसे आंसू अपनी सीमा को तोड़ने की कोशिश कर रहे हों, लेकिन वह उन्हें बहने नहीं देना चाहती थी। उसने बस एक लंबी, गहरी सांस ली, जैसे उस सांस में अपने भीतर छुपी सारी पीड़ा और अनकही कसक को समेट रही हो। उसकी आँखों में उस चुप्पी की गहरी सर्दी थी, जो शब्दों से कहीं ज्यादा कह रही थी, और उस चुप्पी में वह दर्द था, जो दिल में कहीं गहरे दबा हुआ था।

तभी दरवाजे की घंटी बजी।

रीमा ने घड़ी देखी— रात के 2:15।

उसने धीरे से दरवाजा खोला। राघव सामने खड़ा था— आँखों के नीचे हलके काले घेरे थे, चेहरे पर थकान की लकीरें साफ़ झलक रही थीं। उसके बाल बिखरे हुए थे, जैसे पूरी रात सोने से पहले खुद को संजीदगी से सँभालने का वक्त न मिला हो। उसकी आँखों में उनींदापन था, और हाथ में फोन था, जिस पर कोई नोटिफिकेशन आया था, लेकिन वह उसे देख नहीं रहा था, जैसे किसी खबर ने उसकी चेतना से परे कुछ कर दिया हो।

राघव (थके हुए स्वर में, अंदर आते हुए):
"बहुत लेट हो गया न?"

रीमा ने राघव को देखा, उसकी आँखें कुछ कहने को तैयार थीं, लेकिन शब्द जैसे कंठ में अटक गए थे। उसके भीतर एक गहरी चुप्पी छाई हुई थी, जैसे समय के साथ जो भी बातें अनकही रह गईं, वे अब कभी न बोली जा सकेंगी। उसका मन हुआ कि कुछ बोले, शायद वही जो उसे हमेशा से महसूस हो रहा था— "हाँ, बहुत देर हो गई... सिर्फ इस रात के लिए नहीं, हमारे रिश्ते के लिए भी।"

लेकिन उस पल में उसने खुद को रोक लिया। उसके भीतर कोई था जो जानता था कि अब शब्दों की कोई अहमियत नहीं रह गई है। वह जान चुकी थी कि कुछ खामोशियाँ, कुछ फासले, कुछ बातें जो दिल में दबी रह जाती हैं, वे कभी टूटती नहीं। वक्त के साथ उन्होंने जो रूप लिया था, वह अब ऐसी चुप्पियाँ बन चुकी थीं जिन्हें शब्दों से नहीं, सिर्फ महसूस किया जा सकता था। और वही खामोशियाँ, वही दूरियाँ अब उनके रिश्ते की हकीकत बन चुकी थीं— एक ऐसी हकीकत जिसे दोनों जानते थे, लेकिन स्वीकार करने की हिम्मत किसी में भी नहीं थी।

सुबह का वक्त था। सूरज की हल्की किरणें खिड़की से होकर कमरे में दाखिल हो रही थीं। राघव घर लौट चुका था। चेहरे पर थकान थी, बाल अस्त-व्यस्त, और हाथ में उसका फोन था, जिस पर वो बार-बार नजरें दौड़ा रहा था। जैसे हर चीज़ से उसकी नज़र हटा कर उसे सिर्फ उस छोटे स्क्रीन से प्यार हो।

वह सीधे सोफे पर बैठा और बिना रीमा से कुछ कहे अपने फोन पर न्यूज चेक करने लगा।

रीमा (हल्की मुस्कान के साथ, चाय की ट्रे लिए हुए):
"कैसी रही रात? या फिर वही सब... भागदौड़, खबरें और पॉलिटिकल ड्रामा?"

राघव ने एक नज़र स्क्रीन पर डाली, फिर बिना उसकी ओर देखे जवाब दिया। आवाज़ में वही नीरसता थी, जो कई महीनों से उसके शब्दों में आ चुकी थी।

राघव (सिर झुका कर, लापरवाही से):
"उसी तरह जैसी हमेशा होती है— खबरें, भागदौड़, और पॉलिटिकल ड्रामा!"

रीमा ने चाय की ट्रे को टेबल पर रखा और एक पल के लिए राघव को देखा, फिर धीरे से बोली।

रीमा (संकोच से, फिर भी धीरे से):
"और हमारी रातें?"

राघव ने कुछ पल के लिए उसकी ओर देखा और फिर फौरन नज़रें वापस फोन पर डाल दीं। उसकी आँखों में एक सवाल था, लेकिन साथ ही एक लापरवाही भी— जैसे उसे सच में कोई फर्क नहीं पड़ा।

राघव (कभी भी न रुके, थकान भरे शब्दों में):
"मतलब?"

रीमा का मन हुआ कि कहे— "मतलब ये कि हम दोनों अब एक-दूसरे के पास नहीं हैं, राघव। हमारी रातें अब सिर्फ खामोशी और अनकही बातें हैं।"

लेकिन उसने कुछ नहीं कहा। बस चुपचाप चाय की ट्रे को अंदर ले जाती हुई, एक ठंडी सांस ली।

उसके मन में एक सवाल तैर रहा था— "क्या हम एक-दूसरे से उतना प्यार करते हैं जितना एक वक्त तक सोचते थे?"

यह अब कोई साधारण सवाल नहीं था। यह एक गहरी दरार थी, जो दोनों के बीच एक-दूसरे से दूर होने की शुरुआत को महसूस कर रही थी।

रीमा की खामोशी में एक अजीब सा दर्द था, लेकिन उसने कभी शब्दों में यह दर्द नहीं ढाला। वह जानती थी कि शब्दों से ज्यादा मौन ने उसे और राघव को और दूर कर दिया था।

जब वह ट्रे लेकर रसोई में गई, तब राघव ने सोफे पर झुकते हुए अपनी आँखों से स्क्रीन को एक बार फिर से घूर लिया।

लेकिन अब उसका ध्यान खबरों में नहीं था— उसका मन कहीं और था, उसी सवाल में डूबा हुआ था जो रीमा ने पूछा था।

रीमा की सहेली ने उसे जबरदस्ती एक मनोचिकित्सक से मिलने की सलाह दी थी। शुरू में उसने इसे सिर्फ एक और निरर्थक कोशिश के तौर पर लिया था, लेकिन समय की कमी और अपने भीतर के खालीपन ने उसे मजबूर कर दिया। उसे लगा, अगर वह इस दौर से निकलना चाहती है, तो शायद ये आखिरी रास्ता हो।

जब वह पहली बार अयान के पास पहुंची, तो मन में काफी उलझन थी। कमरे में हल्की सी ठंडी हवा बह रही थी, और अयान के चेहरे पर एक शांत, संतुलित मुस्कान थी।

अयान (धीरे से, गर्मजोशी से):
"रीमा, बैठिए। आपको देखकर ऐसा लग रहा है जैसे आप खुद को खो चुकी हैं। कुछ शेयर करना चाहेंगी?"

रीमा ने चुपचाप बैठते हुए कुछ भी कहने से पहले एक गहरी सांस ली। अयान ने उसकी आँखों में कुछ ऐसा देखा था जो शब्दों से बाहर था। एक गहरी थकावट, एक खोया हुआ सा दर्द, और खुद से कट जाने का एहसास।

अयान (धीमे, समझदारी से):
"रीमा, आपको क्या लगता है, आपको क्या चाहिए?"

यह सवाल अचानक से उसके भीतर गूंज उठा। कभी भी किसी ने उससे यह सवाल नहीं पूछा था, और खुद से यह सवाल पूछने की कभी जरुरत महसूस नहीं हुई थी। हमेशा दूसरों की उम्मीदें, जरूरतें और इच्छाएं तय करती थीं कि उसे क्या चाहिए। मगर अब, खुद के बारे में सोचने पर रीमा को खुद से ही जवाब नहीं मिला।

रीमा (धीरे से, असमंजस में):
"मुझे नहीं पता... शायद मुझे सिर्फ ये महसूस करना चाहिए कि मैं भी जरूरी हूँ।"

अगले कुछ हफ्तों में, अयान से बातचीत करते-करते रीमा ने धीरे-धीरे महसूस किया कि उसका दर्द सिर्फ बाहरी कारणों से नहीं था, बल्कि उसके भीतर एक चुप्पी, एक आत्मसंयम था। वह सबको खुश रखने की कोशिश कर रही थी, खुद को भूलते हुए। अयान की बातें धीरे-धीरे उसे इस सच से अवगत करवा रही थीं।

अयान (गंभीर स्वर में, गहरी नजरों से):
"रीमा, जब आप आईने में खुद को देखती हैं, तो आपको कौन दिखता है— राघव की पत्नी या रीमा?"

यह सवाल उसके दिल में जैसे एक झंकार की तरह गूंज गया। उसे लगा जैसे वह किसी अंधेरे गलियारे में खो गई थी, और अब इस एक सवाल से वो गलियारा रोशन हो गया था। उसने तुरंत खुद को आईने में देखा— "क्या मैं सिर्फ एक पत्नी हूँ, जो अपने कर्तव्यों में खो चुकी है, या फिर मैं खुद भी एक व्यक्ति हूँ, जो अपनी इच्छाओं और जरूरतों के लिए खड़ा हो सकता है?"

रीमा की आँखों में अचानक से नमी आ गई। वह लम्बे वक्त से खुद को अनदेखा कर चुकी थी। आज पहली बार उसे महसूस हुआ कि वह भी एक इंसान है, जो बस एक रिश्ते में बंध कर रह गया था।

रीमा (धीरे से, हल्के से रोते हुए):
"शायद... सिर्फ एक परछाईं।"

अयान ने चुपचाप उसका हाथ लिया और उसे महसूस कराया कि यह परछाईं नहीं, बल्कि वह खुद एक ज़िन्दगी है, जिसे फिर से जीने का हक है।

अयान (धीरे से, सांत्वना देने की कोशिश करते हुए):
"हम सबको खुद से प्यार करना सीखना होता है, रीमा। कभी-कभी हमें अपने भीतर के असली चेहरे को पहचानने के लिए किसी और की मदद की जरूरत होती है।"

रीमा ने उसकी आँखों में एक ताजगी पाई। जैसे वह धीरे-धीरे अपनी खोई हुई पहचान वापस पा रही थी। उसे यह एहसास हुआ कि यह यात्रा सिर्फ खुद से मिलने की है, और शायद अब समय आ गया है कि वह अपनी पहचान को फिर से तलाशे।

यह अनुभव उसके भीतर बदलाव का एक नन्हा सा बीज बोने जैसा था— अब उसे अपनी ज़िन्दगी का निर्णय खुद से करना था।

राघव घर लौटा, तो घर का माहौल कुछ अलग सा था। कमरे में हल्का सा अंधेरा था, और फर्श पर किताबें फैली हुई थीं। रीमा सोफे पर बैठी, एक किताब में खोई हुई थी। उसकी आँखों में वही खालीपन था, जो वह अब अक्सर महसूस करती थी— जैसे दुनिया उसके चारों ओर घूम रही हो, और वह बस उसी दुनिया से बाहर खड़ी हो।

राघव (थके हुए स्वर में, दरवाजे को खोलते हुए):
"अभी तक जाग रही हो?"

रीमा ने सिर उठाया और मुस्कुराते हुए किताब को एक तरफ रखा। उसकी मुस्कान में एक अजनबियत थी, जैसे वह वही रीमा नहीं रही, जो पहले थी।

रीमा (मुस्कुराकर, फिर से किताब में खोते हुए):
"हाँ, अब नींद कम आती है और सवाल ज्यादा।"

राघव ने उसकी ओर एक पल देखा, फिर धीरे से बैठते हुए उससे पूछा।

राघव (संकोच से, चाय के कप में हाथ घुमाते हुए):
"क्या चल रहा है इन दिनों?"

रीमा ने चुपचाप उसे देखा। उसकी आँखों में कुछ था, जो वह चाहकर भी कह नहीं पाई। फिर एक लंबी खामोशी के बाद, उसने धीमे से कहा।

रीमा (धीरे से, अपनी बात से खुद को जोड़ते हुए):
"सोच रही हूँ... क्या हमारे रिश्ते में मेरी कोई जगह बची भी है?"

राघव का चेहरा एक पल के लिए तिरोहित हो गया। वह बस चुप रहा। उसे समझ में नहीं आया कि क्या कहे। वह अब रीमा से उस जुड़ाव को महसूस नहीं कर पा रहा था, जो पहले हर बात में हुआ करता था।

अगले दिन रीमा ने अपना सामान पैक करना शुरू किया। उसने कुछ कपड़े, किताबें और अपनी निजी चीज़ें एक बैग में रखी। यह दृश्य राघव के लिए एक झटके जैसा था। वह परेशान होकर कमरे में आया और देखते ही उसे यकीन नहीं हुआ।

राघव (गंभीर स्वर में, हड़बड़ाते हुए):
"तुम कहाँ जा रही हो?"

रीमा ने एक पल के लिए उसे देखा, लेकिन उसकी आँखों में कोई आक्रोश या गुस्सा नहीं था— बस एक ठंडा, दृढ़ आत्मविश्वास था। उसने बैग को बंद किया और धीरे से खड़ी हो गई।

रीमा (शांत स्वर में, अपनी आवाज़ में अजीब सा संतुलन रखते हुए):
"अपने पास।"

राघव ने उसे हैरान होकर देखा, जैसे उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि वह जो सुन रहा है, वह सच है। उसकी दुनिया में कुछ गलत हो रहा था, लेकिन उसे समझ नहीं आ रहा था कि कहाँ, क्यों, और कैसे।

राघव (अविश्वास से, घबराहट में):
"मतलब?"

रीमा ने एक गहरी सांस ली और अपनी बात को और स्पष्ट किया।

रीमा (मुस्कुराकर, लेकिन अब उसकी मुस्कान में कोई हल्का सा दर्द था):
"अब मैं खुद को तलाशना चाहती हूँ। पहली बार अपने लिए जीना चाहती हूँ।"

यह वाक्य राघव के लिए किसी आघात से कम नहीं था। उसे महसूस हुआ कि कहीं न कहीं, वह रीमा को खो चुका था। यह खोने की भावना इतनी सटीक थी कि उसने महसूस किया जैसे उसकी ज़िन्दगी में एक अहम हिस्सा चुपके से निकल चुका था।

राघव (नज़रें झुका कर, दुख और हताशा से):
"क्या तुम सच में जा रही हो?"

रीमा (धीरे से, दृढ़ता से):
"हां, राघव। मुझे कुछ समय चाहिए... खुद को जानने के लिए, समझने के लिए। मैं इस रिश्ते में खो गई हूँ, और अब मुझे वापस खुद को पाने की जरुरत है।"

उसकी बातें बिना गुस्से या आरोप के थीं— सिर्फ एक गहरी थकान और आत्मपरीक्षा का परिणाम। राघव को जैसे समझ में आने लगा था कि वह रीमा को खोने से नहीं डर रहा था, बल्कि वह डर रहा था कि कहीं वह खुद को पूरी तरह से खो न दे।

रीमा ने आखिरी बार बैग उठाया और दरवाजे की ओर बढ़ी। राघव ने उसे बिना कुछ कहे बस खड़े होकर देखा। यह न तो किसी विदाई का क्षण था, और न ही कोई अंतिम संवाद— यह एक स्थिर, अंतरंग निर्णय था, जो दोनों के भीतर की खामोश दरारों से उपजा था।

जब रीमा दरवाजा खोले, तो राघव ने एक गहरी सांस ली और महसूस किया कि अब वह वक्त आ गया है जब दो लोग एक-दूसरे के साथ रहने के बावजूद, एक-दूसरे से दूर हो जाते हैं।

रीमा ने अपने जीवन को फिर से पुनर्निर्मित करने की प्रक्रिया में एक नई दिशा अपनाई थी। वह अब उस सामाजिक संस्था में काम कर रही थी, जो उन महिलाओं की मदद करती थी जो किसी न किसी रूप में खुद को खो चुकी थीं—जिनकी इच्छाएं, आकांक्षाएं और सपने किसी और के कंधे पर रखे गए थे। अब वह खुद की तलाश कर रही थी, और अब उसका हर कदम उसके खुद के फैसले पर आधारित था।

एक शाम, रीमा बालकनी में खड़ी थी। हल्की सी ठंडी हवा उसके चेहरे पर थपकी ले रही थी, और रात का अंधेरा धीरे-धीरे घना हो रहा था। उसकी आँखों में अब वही चुप्पी नहीं थी, जो पहले हर पल में गहरी हो जाती थी। अब उसकी आँखों में एक नयी ज्योति थी, जो न केवल उसकी आत्मा को रोशन कर रही थी, बल्कि उसे पूरी दुनिया से भी जोड़े रख रही थी।

उसने अपनी आँखें बंद कीं, और खुद को उस ठंडी हवा में महसूस किया। यह पहला पल था जब उसने महसूस किया कि वह सिर्फ साँस नहीं ले रही थी, बल्कि वह जी रही थी—अपने तरीके से, अपनी शर्तों पर। उसने अपनी कलाई घड़ी से समय देखा, और फिर अपने फोन में देखा। राघव का नाम फोन स्क्रीन पर चमक रहा था। एक पल के लिए, वह ठिठकी। फिर, कुछ ऐसा हुआ जो पहले कभी नहीं हुआ था—उसने स्क्रीन को लॉक कर दिया।

रीमा (धीरे से, अपने मन में कहती हुई):
"अब मेरे फैसले किसी रिश्ते की मोहताज़ नहीं होंगे।"

उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान थी, लेकिन यह मुस्कान खोखली नहीं थी। यह आत्मनिर्भरता, विश्वास और उस शक्ति का प्रतीक थी जो उसने अपने भीतर फिर से ढूँढी थी। वह अब किसी को यह साबित करने के लिए नहीं जी रही थी कि वह मायने रखती है, क्योंकि अब उसे खुद से यह समझ में आ चुका था कि वह कितनी महत्वपूर्ण है।

रीमा ने फोन को पूरी तरह से अपनी तरफ से हटा दिया, जैसे वह पूरी तरह से उसके किसी भी भावनात्मक गिरफ्त से मुक्त हो चुकी हो। वह एक नई उड़ान भरने के लिए तैयार थी, और इस बार वह किसी और के सहारे नहीं, बल्कि खुद की शक्ति और आत्मविश्वास के सहारे आसमान में उड़ने का ख्वाब देख रही थी।

उसने एक गहरी सांस ली और भीतर से एक नया संकल्प लिया। वह केवल उन महिलाओं की मदद नहीं कर रही थी, बल्कि अब वह खुद भी अपनी ज़िन्दगी में एक नई दिशा में उड़ान भरने जा रही थी।

रीमा (धीरे से, खुद से):

"पंखों की तलाश सिर्फ उड़ान के लिए नहीं होती, कभी-कभी खुद को ढूँढने के लिए भी करनी पड़ती है।"

रीमा के चेहरे पर अब एक नयी चमक थी, जैसे उसकी आँखों में एक नई रोशनी ने दस्तक दी हो। उसकी यात्रा अब सिर्फ एक खोज नहीं थी, बल्कि एक गहरी आत्म-समझ और मुक्ति का सफर बन चुकी थी। वह महिला, जो कभी किसी रिश्ते की बेड़ियों में बंधी हुई थी, अब अपनी ज़िन्दगी का नया रास्ता खुद बना रही थी। वह सिर्फ अपने रिश्तों में नहीं, बल्कि खुद में भी खो गई थी। आज, उस खोई हुई आत्मा को फिर से खोजने का साहस पा चुकी थी।

उसकी आत्मनिर्भरता की यह कहानी केवल उसकी नहीं थी, यह हर उस महिला की कहानी थी, जो अपनी पहचान में खोकर फिर से उसे पाने की जद्दोजहद में है। यह एक संघर्ष की कहानी थी, एक आंतरिक शक्ति की, जो हर दर्द और हर संकट के बावजूद खुद को खड़ा करने की ताकत जुटाती है।

यह खत्म नहीं हुआ था—यह तो एक नई शुरुआत थी, जहां रीमा ने खुद को खोकर फिर से पाया, और अब वह केवल अपने सपनों और उम्मीदों के साथ नहीं, बल्कि अपनी असली ताकत और पहचान के साथ आगे बढ़ रही थी। इस यात्रा का अंत नहीं था, बल्कि यह उसके आत्म-निर्माण की एक नई कहानी की शुरुआत थी, जहाँ हर कदम वह अपने भीतर के सबसे सच्चे रूप को खोज रही थी।

©® अमरेश सिंह भदौरिया

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