रामनवमी: मर्यादा, धर्म और आत्मबोध का पर्व
रामनवमी केवल एक उत्सव नहीं, अपितु आत्मबोध और सामाजिक चेतना का जागरण है। यह दिवस बाह्य आडंबर से परे, अंतःकरण में निहित दिव्यता को जागृत करने का अवसर है। श्रीराम केवल इतिहास के पृष्ठों में अंकित एक चरित्र नहीं, बल्कि सनातन धर्म की आत्मा, मर्यादा का आदर्श और कर्तव्य की परम निष्पत्ति हैं। उनका जीवन यह दर्शाता है कि सत्य और धर्म की यात्रा सरल नहीं होती, किंतु यही मार्ग आत्मविजय और लोकमंगल की ओर ले जाता है।
रामनवमी हमें स्मरण कराती है कि रामत्व कोई बाह्य सत्ता नहीं, अपितु प्रत्येक चेतन आत्मा में सुप्त एक दिव्य तत्व है, जिसे अनुशासन, त्याग और प्रेम से जाग्रत किया जा सकता है। जब हम अपने भीतर के रावण—अहंकार, मोह और अन्याय—का संहार करते हैं, तभी वास्तविक रामराज्य की स्थापना संभव होती है। यह पर्व केवल अतीत के महापुरुष की जयंतियों में विलीन होने के लिए नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर रामत्व को जागृत करने के लिए है।
आइए, राम के जीवन से प्राप्त गहरे दार्शनिक संदेशों पर विस्तार से विचार करें—
धर्म कोई स्थूल संरचना नहीं, न ही यह केवल अनुष्ठानों और उपदेशों का बाह्य प्रदर्शन मात्र है। यह आचरण की वह सूक्ष्म चेतना है, जो व्यक्ति को उसके कर्तव्यों की दिशा में गतिमान करती है। श्रीराम का जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि धर्म शब्दों में नहीं, कर्म में प्रतिबिंबित होता है। जब उनके समक्ष अयोध्या का राज्य सहज उपलब्ध था, तब उन्होंने सत्ता की आसक्ति को त्यागकर पिता की आज्ञा को धर्म का स्वरूप मानते हुए वनवास स्वीकार किया। यह केवल व्यक्तिगत बलिदान नहीं, बल्कि कर्तव्य और मर्यादा की पराकाष्ठा थी।
आज धर्म को मात्र बाह्य आडंबरों, अनुष्ठानों और रूढ़ियों में सीमित कर दिया गया है, जबकि उसका वास्तविक स्वरूप सत्य, न्याय और करुणा के प्रति अनवरत संकल्प में निहित है। धर्म वह है जो हमारी वृत्तियों को शुद्ध करता है, चेतना को उच्चतर आदर्शों की ओर उन्मुख करता है, और समाज में समरसता स्थापित करता है।
यदि धर्म केवल प्रवचनों और विधि-विधानों तक सीमित रह जाए, परंतु आचरण में उसका कोई प्रतिबिंब न दिखे, तो वह मात्र विचारों का एक भ्रम रह जाता है। इसलिए, वास्तविक धर्म वही है, जो अंतःकरण में जागृत होकर कर्मों के माध्यम से संसार में प्रकट होता है।
सत्य कोई बाह्य उपलब्धि नहीं, बल्कि आत्मा की मौलिक प्रवृत्ति है, जो परिस्थितियों के संकुचित आवरण में भी अपने स्वरूप को नहीं छोड़ती। श्रीराम का संपूर्ण जीवन इस तथ्य का साक्षी है कि सत्य केवल वाणी से घोषित करने की वस्तु नहीं, अपितु प्रत्येक परीक्षा में उसे धारण करने का संकल्प है। उन्होंने सत्ता, सुविधा और व्यक्तिगत सुख को त्यागकर सत्य के मार्ग को चुना—चाहे वह पिता की आज्ञा को शिरोधार्य कर वनगमन हो, सीता की खोज में कठिन संघर्ष हो, या रावण जैसे पराक्रमी अधर्म के प्रतीक से युद्ध।
आज का समाज सुविधाओं और निजी स्वार्थों के कारण सत्य से समझौता करने में संकोच नहीं करता। सत्य को प्रायः तत्कालीन सफलता के समक्ष गौण मान लिया जाता है, किंतु राम का जीवन यह प्रतिपादित करता है कि सत्य का मार्ग चाहे कितना भी क्लेशकारी क्यों न हो, दीर्घकाल में वही वास्तविक विजय और आत्मशांति की ओर ले जाता है।
सत्य के प्रति समर्पण केवल बाह्य संसार में विजय पाने के लिए नहीं, बल्कि आंतरिक चेतना को विकृतियों से मुक्त कर उसे परम सत्य की ओर उन्मुख करने का साधन है। यह मार्ग कठिन अवश्य है, किंतु इसके पथिक ही कालजयी बनते हैं।
शक्ति केवल बाह्य साधनों से अर्जित सामर्थ्य नहीं, बल्कि अंतःकरण की वह स्थिरता है, जो प्रतिकूल परिस्थितियों में भी विचलित नहीं होती। श्रीराम का वनवास केवल भौतिक कष्टों की परीक्षा नहीं थी, बल्कि यह उनके आत्मसंयम और धैर्य की कसौटी भी था। उन्होंने न सुख में अहंकार किया, और न दुख में हताश हुए। उनका मन सदैव स्थितप्रज्ञ बना रहा—संतुलित, संयमित और कर्तव्यनिष्ठ।
आज मनुष्य संयम और धैर्य के अभाव में क्षणिक परिस्थितियों के वशीभूत हो जाता है—क्रोध में अपना विवेक खो बैठता है, अवसाद में आशा त्याग देता है, और छोटी-छोटी कठिनाइयों से पराजित हो जाता है। किंतु श्रीराम का जीवन यह सिखाता है कि जो व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों में भी अपने मन को नियंत्रित रखता है, वही वास्तविक विजेता और आत्मबल का स्वामी होता है।
संयम केवल इच्छा का दमन नहीं, बल्कि चेतना की उच्चतम स्थिति है, जहाँ व्यक्ति सुख-दुख, हानि-लाभ और जय-पराजय से ऊपर उठकर अपने धर्म और कर्तव्य का निर्वाह करता है। यही आत्मसंयम की परम शक्ति है।
धर्म की वास्तविक सार्थकता कर्तव्यनिष्ठा में निहित है। धर्म कोई बाह्य उपदेश या लिपिबद्ध नियम मात्र नहीं, बल्कि वह जीवन-दर्शन है, जो व्यक्ति को अपने दायित्वों की पूर्णता में स्थापित करता है। श्रीराम का संपूर्ण जीवन इसी सिद्धांत का मूर्त रूप है।
उन्होंने सत्ता और सुखों से विमुख होकर पिता की आज्ञा का पालन किया, वन में सीता और लक्ष्मण की रक्षा का दायित्व निभाया, तथा अधर्म और अन्याय के विरुद्ध धर्मयुद्ध किया। यह सभी कृत्य उनकी कर्तव्यपरायणता के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।
आज व्यक्ति अधिकारों की अपेक्षा करता है, परंतु कर्तव्यों के प्रति उदासीन रहता है। परिवार, समाज और राष्ट्र की स्थिरता इसी पर निर्भर करती है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्तव्यों को ईमानदारी से निभाए।
श्रीराम हमें सिखाते हैं कि कर्तव्य का पालन ही वास्तविक धर्म है। जब व्यक्ति स्वार्थ से ऊपर उठकर अपने उत्तरदायित्वों को निष्काम भाव से निभाने लगता है, तब उसका जीवन मात्र व्यक्तिगत सफलता तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समाज और राष्ट्र के उत्थान का साधन बन जाता है।
शक्ति और विजय केवल बाहुबल से नहीं, हृदय की कोमलता और करुणा से प्राप्त होती है। श्रीराम केवल एक पराक्रमी योद्धा नहीं, बल्कि प्रेम, करुणा और समभाव के भी प्रतीक हैं। उनका जीवन इस सत्य को प्रतिपादित करता है कि संपूर्ण नेतृत्व शक्ति से नहीं, बल्कि प्रेम और करुणा के संतुलन से संपन्न होता है।
निषादराज के प्रति उनकी मित्रता, शबरी के प्रेम को सहर्ष स्वीकार करना, तथा हनुमान के प्रति स्नेह—सभी यह दर्शाते हैं कि राम जाति, वर्ग और स्थिति से परे प्रेम के आधार पर ही संबंध स्थापित करते थे। यह करुणा ही थी, जिसने उन्हें रावण के प्रति भी अनावश्यक क्रोध से दूर रखा; वे उसे समर्पण का अवसर देते हैं, उसे ज्ञान का उपदेश भी देते हैं।
आज का समाज विभाजन, घृणा और हिंसा की ओर बढ़ रहा है। शक्ति का प्रदर्शन प्रेम और करुणा को दुर्बलता मानने लगा है, किंतु राम का संदेश स्पष्ट है—जहाँ शक्ति अंहकार में परिवर्तित होती है, वहाँ विनाश निश्चित होता है।
करुणा केवल भावुकता नहीं, बल्कि सबसे शक्तिशाली शस्त्र है, जो शत्रु को भी आत्मसमर्पण करने पर विवश कर देती है। समाज में स्थिरता और समरसता तभी संभव है, जब शक्ति के साथ करुणा का संतुलन बना रहे। श्रीराम हमें सिखाते हैं कि सच्ची विजय बाहुबल से नहीं, हृदय की विशालता से होती है।
जीवन की वास्तविकता स्थायित्व नहीं, अपितु अनवरत परिवर्तन है। श्रीराम का वनवास केवल एक भौगोलिक विस्थापन नहीं था, बल्कि यह जीवन के अनिश्चित स्वभाव को स्वीकार करने और उसे गरिमा व धैर्य से जीने की सीख भी देता है।
सुख-दुःख, हानि-लाभ, सफलता-असफलता—ये सभी जीवन के अनिवार्य पड़ाव हैं। जो व्यक्ति इन परिवर्तनों को सहजता और संतुलन के साथ स्वीकार करता है, वही मानसिक और आत्मिक रूप से सशक्त होता है। श्रीराम ने न तो राज्य की प्राप्ति पर अहंकार किया, न ही वनवास के कष्टों में दुखी होकर अपने कर्तव्यों से विमुख हुए। उनके लिए जीवन का प्रत्येक चरण धर्म और कर्तव्य की यात्रा था।
आज मनुष्य जीवन की अस्थिरताओं से घबरा जाता है—कभी असफलता उसे निराश कर देती है, तो कभी सफलता अहंकार में बदल जाती है। किंतु राम हमें सिखाते हैं कि जीवन को गरिमा, धैर्य और संतुलन से जीना ही वास्तविक विजय है।
वनवास केवल जंगल में रहना नहीं, बल्कि जीवन के कठिन और अनिश्चित मार्ग को स्वीकार करना है। हमें यह समझना होगा कि सुख और दुख, दोनों ही अस्थायी हैं; जो इन द्वंद्वों से परे रहकर अपने कर्तव्य को निभाता है, वही सच्चा विजेता होता है।
अहंकार आत्मविनाश का कारण है, क्योंकि यह सत्य को देखने की क्षमता को नष्ट कर देता है। रावण केवल बाह्य शक्ति से नहीं, बल्कि अपने अहंकार के भीतर ही पराजित हो चुका था। उसके पास अद्वितीय ज्ञान था, अपार बल था, किन्तु जब अहंकार ने उसे सत्य से विमुख कर दिया, तो उसका पतन अपरिहार्य हो गया।
अहंकार व्यक्ति को वास्तविकता से विमुख कर भ्रम के संसार में डाल देता है, जहाँ वह अपने पतन को भी विजय मानने की भूल करने लगता है। रावण ने जब अपनी शक्ति का उपयोग धर्म और सत्य के विरुद्ध किया, तब वह पराजय की ओर अग्रसर हुआ। श्रीराम का जीवन इसके विपरीत है—उन्होंने शक्ति के साथ विनम्रता, और विजय के साथ संयम को धारण किया।
आज भी व्यक्ति, समाज और राष्ट्र अहंकार के कारण विनाश की ओर बढ़ सकते हैं—चाहे वह व्यक्तिगत अहंकार हो, सत्ता का दुरुपयोग हो, या धन और ज्ञान का गर्व। अहंकार मनुष्य को इतना अंधा कर सकता है कि वह अपने विनाश की आहट को भी अनसुना कर देता है।
श्रीराम हमें सिखाते हैं कि असली शक्ति शक्ति में नहीं, बल्कि उसके संयम में है। विनम्रता और सत्य ही वास्तविक सफलता के आधार हैं। जो व्यक्ति विनय को छोड़कर अहंकार की ओर बढ़ता है, वह स्वयं ही अपने अंत का मार्ग प्रशस्त करता है।
व्यक्ति का जीवन केवल व्यक्तिगत सुख-संपदा तक सीमित नहीं हो सकता; उसका वास्तविक उद्देश्य समाज की उन्नति और कल्याण में निहित होता है। श्रीराम का संपूर्ण जीवन त्याग, परोपकार और समाज-हित के प्रति समर्पण का उदाहरण है। उन्होंने व्यक्तिगत इच्छाओं और राजसुख को त्यागकर धर्म और लोकमंगल को सर्वोच्च स्थान दिया।
राम ने वनवास को भी एक व्यक्तिगत कष्ट के रूप में नहीं, बल्कि लोकहित में स्वीकार किया। वे केवल एक आदर्श राजा नहीं थे, बल्कि समाज के संरक्षक और मार्गदर्शक भी थे। उनके राज्य में न्याय, समानता और सेवा ही शासन के मूल सिद्धांत थे।
आज समाज स्वार्थ और व्यक्तिगत लाभ की प्रवृत्तियों से ग्रस्त होता जा रहा है। यदि प्रत्येक व्यक्ति केवल अपने हित की न सोचकर समाज के कल्याण में योगदान दे, तो संपूर्ण व्यवस्था में सुधार संभव है।
श्रीराम हमें सिखाते हैं कि व्यक्ति की पूर्णता केवल आत्मसुख में नहीं, बल्कि समाज की सेवा में निहित है। जब सेवा और परोपकार किसी राष्ट्र या समाज का आधार बनते हैं, तब वह केवल शक्ति से नहीं, बल्कि करुणा और न्याय से संचालित होता है।
सच्चा नेतृत्व और वास्तविक जीवन-दर्शन वहीं है, जहाँ व्यक्ति अपने हितों से ऊपर उठकर समाज के कल्याण में समर्पित हो जाता है।
किसी भी सभ्यता की वास्तविक प्रगति उसके भौतिक वैभव में नहीं, बल्कि उसकी नारी के प्रति दृष्टिकोण में निहित होती है। जब समाज में नारी सम्मानित होती है, तब संस्कृति पुष्पित होती है; और जब उसका अपमान होता है, तब समाज अपने ही पतन की आधारशिला रखता है।
श्रीराम केवल एक पति नहीं, बल्कि स्त्री गरिमा के रक्षक और नारी सम्मान के प्रतीक भी हैं। रावण का वध केवल व्यक्तिगत प्रतिशोध नहीं था, बल्कि यह उस अधर्म के विरुद्ध एक धर्मयुद्ध था, जो स्त्री को मात्र भोग्या मानता था। सीता केवल एक नारी नहीं थीं, बल्कि शक्ति, त्याग और धैर्य की प्रतिमूर्ति थीं। उनका वनवास केवल एक घटना नहीं, बल्कि नारी की परीक्षा, सहनशीलता और समाज में उसकी स्थिति पर एक प्रश्नचिह्न था।
आज भी समाज स्त्री की स्वतंत्रता, उसकी शिक्षा और समानता के प्रश्नों से जूझ रहा है। यदि किसी राष्ट्र में नारी सुरक्षित नहीं है, तो उसकी प्रगति केवल एक छलावा मात्र है। नारी केवल माता, बहन, पत्नी या पुत्री नहीं, बल्कि समाज की आधारशिला और संस्कृति की रक्षक है।
श्रीराम हमें सिखाते हैं कि नारी केवल सम्मान की अधिकारी नहीं, बल्कि शक्ति की प्रतीक भी है। यदि कोई समाज उसकी गरिमा को ठेस पहुँचाता है, तो वह स्वयं ही अपने विनाश को आमंत्रित करता है। नारी का सम्मान, सुरक्षा और समानता ही किसी सभ्यता के उच्च या निम्न होने का वास्तविक मापदंड है।
समय प्रत्येक सत्य की परीक्षा लेता है, किंतु जो धैर्यवान होता है, वही कालचक्र पर विजय प्राप्त करता है। श्रीराम का जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि अधीरता मनुष्य को लक्ष्य से विचलित कर सकती है, किंतु धैर्य उसे दिव्यता की ओर ले जाता है।
राम को अपने अधिकारों, न्याय और विजय के लिए वर्षों तक प्रतीक्षा करनी पड़ी। उन्होंने अपने राज्य को खोया, वनवास सहा, सीता को खोया, मित्रों और भाइयों का कष्ट देखा, किन्तु उन्होंने कभी अधीरता नहीं दिखाई। यदि वे किसी भी क्षण अधीर हो जाते, तो संभवतः धर्म की स्थापना का मार्ग ही बदल जाता।
आज का समाज तात्कालिक सुख और शीघ्र परिणामों की मानसिकता से ग्रसित है। लोग कठिन परिश्रम का समुचित परिणाम न मिलने पर तुरंत हताश हो जाते हैं। वे भूल जाते हैं कि प्रत्येक महान उपलब्धि के पीछे धैर्य और प्रतीक्षा की शक्ति निहित होती है।
राम हमें सिखाते हैं कि धैर्य केवल एक गुण नहीं, बल्कि आत्म-विकास का पथ है। जब व्यक्ति अपने लक्ष्य की ओर निरंतर बढ़ता है और समय पर विश्वास रखता है, तो उसका श्रम व्यर्थ नहीं जाता।
सही समय पर किया गया सही प्रयास कभी निष्फल नहीं जाता। धैर्य के साथ किया गया कार्य ही असली सफलता को जन्म देता है।
बाह्य संसार में जितने भी संघर्ष हैं, वे अंततः आत्मसंघर्ष का ही प्रतिबिंब हैं। जो व्यक्ति स्वयं को जान लेता है, वही इस नश्वर जगत के बंधनों से मुक्त हो सकता है। श्रीराम का जीवन केवल एक राजा, योद्धा या मर्यादा पुरुषोत्तम का जीवन नहीं, बल्कि आत्मबोध की यात्रा भी है। उन्होंने न केवल बाह्य संघर्षों का सामना किया, बल्कि अहंकार, मोह, लोभ और क्रोध पर भी विजय प्राप्त की।
राम का वनवास केवल एक शारीरिक त्याग नहीं था, बल्कि मोह, आत्ममोह और सांसारिक सुखों से मुक्ति की प्रक्रिया थी। उन्होंने हर परिस्थिति में आत्मसंयम बनाए रखा, न राज्याभिषेक पर अहंकार किया, न वनवास में विषाद। यही आत्मज्ञान का सबसे बड़ा संकेत है—स्वयं को पहचानना, परिस्थितियों से ऊपर उठना और अपने भीतर के शत्रुओं पर विजय प्राप्त करना।
आज मनुष्य बाह्य उपलब्धियों और भौतिक सुखों के पीछे दौड़ रहा है, किंतु स्वयं को जानने का प्रयास नहीं कर रहा। धन, प्रतिष्ठा और अधिकार के पीछे भागते हुए वह अपनी आत्मिक शांति को विस्मृत कर चुका है। वह सोचता है कि संसार में विजय ही मुक्ति है, किंतु वास्तविक मुक्ति आत्मज्ञान में निहित है।
राम हमें सिखाते हैं कि मुक्ति केवल मृत्यु के बाद नहीं, बल्कि जीवन में भी प्राप्त की जा सकती है—जब मनुष्य स्वयं को, अपने दोषों को, अपनी सीमाओं को और अपनी चेतना को समझ लेता है। जब तक यह बोध नहीं होता, तब तक कोई भी व्यक्ति, चाहे वह कितना भी सफल क्यों न हो, भीतर से बंधा हुआ ही रहता है।
अतः आत्मज्ञान ही वास्तविक मुक्ति है, क्योंकि जो स्वयं को पहचान लेता है, वह संसार के हर बंधन से स्वतः मुक्त हो जाता है।
राम केवल इतिहास का एक चरित्र नहीं, बल्कि चेतना की एक अवस्था हैं। वे किसी कालखंड में जन्मे राजा मात्र नहीं, बल्कि धर्म, मर्यादा और करुणा के शाश्वत सिद्धांत का जीवंत स्वरूप हैं। उनका अस्तित्व किसी मूर्ति, ग्रंथ या कथा तक सीमित नहीं, बल्कि हर उस हृदय में विद्यमान है, जो सत्य, कर्तव्य और त्याग के मार्ग पर चलता है।
रामत्व आत्मसंयम है, रामत्व कर्तव्यपरायणता है, रामत्व प्रेम और सहिष्णुता है। यदि हम अपने भीतर के लोभ, मोह, क्रोध और अहंकार को त्याग दें, तो हम स्वयं रामत्व का अनुभव कर सकते हैं। जिस प्रकार सूर्य को दीपक दिखाने की आवश्यकता नहीं, उसी प्रकार सत्य और धर्म का मार्ग अपनाने वाले व्यक्ति को किसी बाह्य प्रमाण की आवश्यकता नहीं—वह स्वयं रामत्व का अनुभव करने लगता है।
रामनवमी केवल श्रीराम के जन्म का उत्सव नहीं, बल्कि हमारे भीतर स्थित रामत्व को जागृत करने का अवसर है। यदि हम राम को केवल मंदिरों में पूजेंगे, किंतु अपने जीवन में उनके आदर्शों को नहीं अपनाएंगे, तो हमारी भक्ति अधूरी रह जाएगी।
रामत्व का अर्थ है—मर्यादा का पालन, अन्याय के विरुद्ध खड़ा होना, अपने कर्तव्यों का निर्वहन और सभी प्राणियों के प्रति करुणा रखना। जब व्यक्ति अपने अहंकार, ईर्ष्या और सांसारिक लालसाओं से ऊपर उठता है, तभी वह रामत्व को आत्मसात करता है।
अतः राम कहीं बाहर नहीं, वे हमारे भीतर हैं। उन्हें केवल मूर्तियों में देखने के बजाय अपने विचारों, कर्मों और आचरण में प्रतिष्ठित करना ही वास्तविक रामनवमी है।
रामनवमी केवल उत्सव का उल्लास नहीं, बल्कि आत्मबोध की अनुभूति है। यह एक ऐसा दर्पण है, जिसमें हम अपने भीतर झाँक सकते हैं—क्या हमारे भीतर का रावण अभी भी जीवित है? क्या हमने मोह, अहंकार, लोभ और असत्य को त्यागने का प्रयास किया है?
रामत्व बाहर नहीं, भीतर है। रामराज्य कोई भौगोलिक संरचना नहीं, बल्कि मनुष्य के अंतःकरण की निर्मल अवस्था है। जब व्यक्ति सत्य के प्रति अडिग, धर्म के प्रति समर्पित और करुणा में समाहित हो जाता है, तब वह स्वयं रामत्व को प्राप्त कर लेता है।
राम को केवल इतिहास में मत खोजो, उन्हें अपने विचारों में प्रतिष्ठित करो। वे मूर्तियों में नहीं, हमारे आचरण, व्यवहार और चिंतन में जीवंत होने चाहिए। यदि हमने राम के गुणों को अपने भीतर जागृत कर लिया, तो वही सच्ची रामनवमी होगी, और वही सत्य का वास्तविक विजय पर्व।
"रामत्व कोई कथा नहीं, यह आत्मजागरण की अवस्था है। इसे प्राप्त करना ही जीवन की परम सार्थकता है।"
जय श्रीराम!
©®अमरेश सिंह भदौरिया
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