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मछली पालन

 

 

रोजगार का अनुपम साधन मछली पालन

 


अनुज कुमार आचार्य

 

 


आजादी के बाद जैसे-जैसे भारत में विकास की प्रक्रिया तेज हुई है, औद्योगिकीकरण की रफ्तार बढ़ी है, जनसंख्या भी चैगुनी हो चुकी है और इस वृद्धि के साथ ही रोजगार की समस्या भी विकराल रूप धारण करती जा रही है। हालांकि रोजगार के नए क्षेत्रों की खोज भी हुई है लेकिन वह भी वर्तमान मांग को पूरा कर पाने में असमर्थ साबित हो रही है। आजादी के बाद हुई ‘हरित क्रान्ति’ ने यद्यपि भारत को अन्न उत्पादन के क्षेत्र मंें पूर्णतया आत्म-निर्भर बना दिया है तथापि बढ़ती हुई आबादी एवं बेरोजगारी के कारण हमें कृषि, उद्योग-धन्धों पर आश्रित रहने की अपनी प्रवृत्ति को बदलना होगा, अर्थात् रोजगार के नए क्षेत्रों की तलाश जारी रखनी होगा। मछली उत्पादन भी एक ऐसा ही क्षेत्र है जहां थोड़ी से मेहनत करके अच्छी आमदनी कमाई जा सकती है, जैस-एक एकड़ जमीन में मछली पालन करके खेती-बाड़ी के मुकाबले तिगुनी आय कमाई जा सकती है। दूसरे, मछली पालन के लिए मेहनत भी उतनी नहीं लगती, जितनी की खेती-बाड़ी मंे लगती है। ऊपर से मजे या लाभ की बात यह है कि जो जमीन कृषि की दृष्टि से उपजाऊ न हो, उसे मछली पालन के लिए प्रयोग में लाया जा सकता है। मछली पालन के लिए प्रयुक्त होने वाले तालाब की खुदाई पर खर्च के बाद अन्य कार्यों तथा मछली के बीज पर काफी कम खर्चा आता है। यह एक ऐसा व्यवसाय है जिस पर मौसम का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। मछली मंे भरपूर मात्रा मंें प्रोटीन, विटामिन और खनिज पदार्थ होते हैं। मछली का आहार, गर्भवती महिलाओं एवं बच्चों और तेज रक्तचाप वाले रोगियों के लिए सर्वोत्तम है। इसलिए शारीरिक तन्दुरूस्ती के लिए मछली का सेवन काफी लाभदायक है।

 


मछली पालन के लिए तालाब का चुनाव करते समय इस बात को ध्यान में रखें कि वहां पर खुदाई करने के लिए पानी खड़ा रहना चाहिए। तालाब रेतीला नहीं होना चाहिए अन्यथा उसमें पानी टिकेगा नहीं। तालाब मंे चिकनी मिट्टी की मात्रा 20 प्रतिशत से 30 प्रतिशत तक होनी चाहिए, पानी में खारापन भी होना जरूरी है। नये तालाब की खुदाई इस प्रकार से की जानी चाहिए कि उसमें पानी हर समय 6 फुट तक सारा साल रूका रह सके। मछली को पानी मंे घुली हुई आॅक्सीजन से सांस लेने पर निर्भर रहना पड़ता है और उसे पानी से ही कुदरती तौर पर खुराक मिलती है। तालाब में समयानुसार खुराक, खाद इत्यादि डालते रहना चाहिए। नाइट्रोजन व फास्फोरस और सुपर फाॅस्फेट, गोबर में मिलाते रहने से मछलियों के लिए लाभप्रद रहता है। तालाब मंें चूना डालने से जहां इन उर्वरकों की क्षमता बढ़ जाती है वहीं पैरासाइट कीड़े भी मर जाते हैं और पानी में घुली हुई मिट्टी नीचे बैठ जाती है। इस प्रकार सूर्य की रोशनी तह तक पहुंच जाती है और इसमंे आॅक्सीजन की मात्रा भी बढ़ जाती है।

 


एक हेक्टेयर तालाब जिसमें दस हजार मछली की पैदावार हासिल करने की क्षमता हो, उसमंे खाद व खुराक का सूचीबद्ध कार्यक्रम इस प्रकार होना चाहिए। ताजा गोबर-15 हजार कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर प्रतिवर्ष, मुर्गियों की बीठ-5 हजार कि.ग्रा. प्रति वर्ष हेक्टेयर, सुपर फास्फेट-1,500 कि.ग्राम हैक्टेयर प्रतिवर्ष। यह सामग्री मछली पालन शुरू करते समय शुरू के एक साल के लिए इकट्ठी डाली जायेगी। उसी तालाब में खुराक की दूसरी किश्त इस प्रकार होगी-ताजा गोबर, मुर्गियों की बीठ और सुपर फास्फेट, प्रतिमाह नये तालाव में 400 कि.ग्रा. डाली जायेगी। चूना- 300 कि.ग्रा., ये ध्यान रखें कि चूने को सुपर फास्फेट डालने के 15 दिन बाद, पानी मंें घोलकर ठण्डा करके डाला जाना चाहिए। तालाब में हमेशा उन मछलियों का बीज डाला जाना चाहिए, जिनकी विकास दर ज्यादा तेज हो और जिनमें आपस मंे मिल-जुलकर इकट्ठे रहने की क्षमता हो और यदि उन्हें अतिरिक्त खुराद दी जाये तो उसे ग्रहण कर लें। मछलियों की इन किस्मों का बीज तालाब में डालकर आप अच्छी कमाई कर सकते हैं:-कतला, राहु, मिराक, सिल्वर, काॅपर, ग्रास काॅपर और कामन काॅपर इत्यादि। उपरोक्त वर्णित सभी किस्मों के बीज, सरकारी मत्स्य बीज उत्पादन केन्द्रों से खरीदे जा सकते हैं, कीमत के लिए भी वहीं से सम्पर्क किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त ये केन्द्र मछली पालन के बारे में आवश्यक जानकारी भी उपलब्ध कराते हैं। यदि समय-समय पर मछली की कसरत करवाई जाती रहे तो उनकी शारीरिक वृद्धि शीघ्र होती है। इसके लिए तालाब मंे एक जाल डालकर मछलियों को हिलाना चाहिए।

 


अन्नतः यह कहा जा सकता है कि यद्यपि शुरू-शुरू में मछली पालन जैसा लघु व्यवसाय आरम्भ करने मंें कुछेक परेशानियां आ सकती हैं लेकिन एक बार तालाब तैयार हो जाने के बाद उनमें बताए गए विवरणानुसार सामग्री डालकर तथा बीज डालकर समय आने पर खासा मुनाफा कमाया जा सकता है। दूसरे, एक बार काम शुरू हो जाने पर इसके लिए ज्यादा आदमियों की आवश्यकता भी नहीं रहती। उत्तर भारत के राज्यों में जहां मछली उत्पादन या सप्लाई बहुत कम है, वहां इस धंधे के फलने-फूलने की संभावनाएं ज्यादा हैं। फिर भी सम्पूर्ण भारत में यह एक उपयोगी रोजगार उपलब्ध करवाने वाला धन्धा साबित हो सकता है। शिक्षित बेरोजगार युवा यदि सरकारी अनुदान प्राप्त कर इस व्यवसाय को अपने हाथों में लें तो स्वरोजगार के लिए इससे बढ़कर और कोई अच्छा साधन क्या होगा। इससे वे जहां माफिक आमदनी कमा सकते हैं वहीं समाज व राष्ट्र की तरक्की में उनके उल्लेखनीय योगदान को भरपूर श्लाघा भी मिलेगी।

 

 

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