Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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है बहुत कुछ खो गया जो

 

है बहुत कुछ खो गया जो, आधुनिकता की दौड़ में,

बिसरा दिये संस्कार संस्कृति, पाश्चात्य की होड़ में।

वाम चिन्तन काम चिन्तन, भोगवादी संस्कृति चलन,

अन्तरंग सम्बन्धों का ढिंढोरा, अब गली के मोड़ में।


परिवर्तन की बयार, हर तरफ़ बहने लगी,

पतन की आबोहवा, चहूँ दिशा चलने लगी।

कौन माता कौन पिता, दादा दादी कौन हैं,

नये दौर की पीढ़ी, खुद में ही जीने लगी।


बिन विवाह संग रहना, ये चलन जब से हुआ,

पारिवारिक मर्यादाओं का, पतन तब से हुआ।

समानता की बात कर, बेटी नग्न रहने लगी,

बाज़ारवाद की दख़ल, फ़ैशन मे ऐसे हुआ।


कुछ युवा आज भी, तम में दीप जला रहे,

संस्कार संस्कृति संरक्षण, जोत जला रहे।

बढ रहा तम धरा पर, भोर होनी निश्चित है,

सूरज उगेगा संस्कारों का, पाप को जला रहे।


पाश्चात्य और सनातन, साथ लेकर चल रहे,

विज्ञान कसौटी पर कस, संस्कारों में ढल रहे।

विगत व आगत की, निज कसौटी तुलना करें,

पाश्चात्य में जन्म लेकर, सनातन में पल रहे।


डॉ अ कीर्ति वर्द्धन



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