तुम इतने जालिम ना होते तो
हमारी छाती पर फन न काढ़ते
तुम मरे हुए लोग हमारे लहू से
स़ीची रोटी पर पलकर तुम
हमारी अस्मिता का जनाजा
सरेआम कैसे निकालते....?
खुद को बना डालो भले ऊंच
हमें कहते रहो नींच............
तुम परजीवी हो दुनिया जानती है
हमारी ही जहां दगाबाजी से
हथिया कर बन गए ऊंच
ये गिरे हुए आदमी का कारनामा है
उठे हुए का कतई नहीं
हम दलित- आदिवासी समता के
मुसाफिर
हम बोते रहे अपनत्व, मातृभूमि प्रेम
तुम खड़ी रहे ऊंच नींच की खाईं
हमारी जहां छिनकर
जाग गयी हो तुम्हारी अन्तर्आत्मा तो
मिला लो बस बराबरी का हाथ
पर और दगा बर्दाश्त होगी नहीं
तैयार हैं भूलाने को तूफानी दिन काली रात
आओ चल पड़े हम साथ साथ।
डां नन्द लाल भारती
11/06/2020
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