बत्तीजार /नन्दलाल भारती
मंदार का दूध तो बहुत जलन कर रहा है अलका बोली l
कांटा कैसे धंस गया, चप्पल पहनने बाद भी केशव पूछा ?
धंस गया कैसे, कहां और क्यों धाँसा क्या बताऊँ बस धंस गया l मंदार का दूध अच्छी तरह चुपड़ दी हूँ कांटा निकल जायेगा,आप फिक्र ना करो बत्तीजार जैसी जलन नहीं हो रही है अलका बोली l
कैसी बात कर दी ? मेरी माँ याद आ गयी l गरीबी, उत्पीड़न और शोषण के वो डरावने दिन याद आ गए अलका केशव बोला l
माँ याद कराने वाली ऐसी कोई खता तो मैंने नहीं की पुष्पा के पापा अलका बोली l
बत्तीजार का नाम सुनकर मेरी कराहती माँ याद आ गयी l मेरी आँखे भी भर आयी केशव बोला l
अनजाने ऐसा कौन सा गुनाह कर गई अलका पूछी?
तुम्हारा गुनाह भी प्यार की चासनी में पका होगा l मैं भूख, गरीबी की बात कर रहा हूँ l गरीबी अपनेआप में बड़ा गुनाह है मोहतरमा, माँ-बाप को गरीबी की दलदल से जीवन की जर्ज़ कश्ती ढकेलते हुए देखा हूँ l गरीबी की आग में पक कर श्रम और संघर्ष में तपकर एसी की हवा खा रहा हूँ केशव बोला l
मुझे भी मालूम है,गरीबी की आंच डरावनी होती है अलका बोली l
अलका तुम्हारे पिताजी पढ़ें-लिखे सरकारी नौकर थे l मेरे पिताजी अनपढ़ मज़दूर केशव बोला l
मानती हूँ तुम मज़दूर माँ-बाप के बेटवा हो पर हो अफसर l मेरे भाई लोग मज़दूर, सोचो और बताओ कौन सफल बाप हैं l मैं जानती हूँ तुम नहीं बताओगे? मैं बताती हूँ मेरे अनपढ़ मज़दूर ससुरजी अलका बोली l
हाँ अलका मेरे माँ-बाप ने अपनी गरीबी का इलाज बत्तीजार से किया है केशव बोला l
क्या बात कर रहे हो अलका बोली ?
हाँ भाग्यवान हाड़फोड़ मेहनत, धान की रोपाई-निराई के कामों में पानी में सड़ते हाथ-पैर से कमाई की दो किलो दिन भर की मजदूरी से पेट की आग बुझाने का दर्द को क्या कहोगी पुष्पा की मैया?
सच बत्तीजार के जलन की छटपटाहट का दर्द और सपनों में जीने की आशा है और क्या अशोक के पापा?
ऐसे ही सुलगते दर्द में मेरे माँ-बाप ने हम भाई-बहनों को पाला है l मुझे और मेरी बड़की बहन दीक्षा को बत्तीजार के दहकते दर्द का नजदीकी एहसास है केशव बोला l
जानती हूँ l पुराने दर्द को याद करने से दर्द ही मिलेगा l
मैं भी जानता हूँ पर कुछ बातें ऐसी होती हैं जो जीते जी नहीं भूलती l मेरे बचपन की बात है माँ ठाकुर की हवेली मज़दूरी लेने चप्पल पहन कर गयी थी, रात में पानी में सडे पैर इलाज बत्तीजार से की थी lयही चप्पल पहनकर हवेली जाना माँ का अपराध हो गया था l
सासुमाँ का अपराध कैसा? अपराधी तो धर्म और जाति के ठिहेदार हैं, ठेकेदार हैं l हम लोग तो देश के मूलनिवासी क्षत्रिय हैं l यूरेशियन लुटेरे आताताइयों और विदेशी मुस्लिम आक्रमणकारी सिकंदरलोदी एवं आक्रमणकारियों से साठगाँठ देश के मूलनिवासी सूर्यवंशी और इक्षाकु वंशीय क्षत्रियों को अछूत, दमित,आदिवासी, वनवासी बना दिए l मूलनिवासी योद्धाराजाओं को राक्षस बना दिएl कायनात के दुश्मनों के सर्वनाश के लिए कब आओगे परमात्मा अलका पूछी?
बात एकदम सच कह रही हो l आज भी हर गाँव की शुरुआत में जो ग्रामरक्षक देवता विराजित हैं, वे भी चंवर वंशीय क्षत्रिय ही तो है l धर्म की भांग पिलाकर खुद पूज्य बन बैठे हैं l इन मठाधीशों एवं ठिहेदारों से मूलनिवासियों से मुक्त होने में और कई सौ साल लगेंगे अलका l देश और शोषित समाज को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने की शुरुआत तो हो गयी है l फिलहाल माँ के साथ क्या-क्या हादसा हुआ आगे सुनो केशव बोला l
सुनाओ जी अलका बोली?
बदमाश चुन्ना बोला-अरे हवेली वालों बाहर निकलो देखो हवेली में गांव की प्रधानइन महावर लगाकर, ऊँची हिल वाली सैंडिल पहन कर आई हैं l माँ हक्का-बक्का हो गई, इधर-उधर, आगे पीछे देखने लगी, जब हवेली की महिलाओं की बैठक के आसपास कोई था ही नहीं l
कौन प्रधाइन चुन्ना बाबू माँ पूछी?
तू रे देवराजिया और कौन चुन्ना गुस्से में लाल होकर बोला l
प्रधाइन कब बन गई मुझे तो पता ही नहीं चुन्ना बाबू?
ये देखो अब चौधराहट भी शुरू l महावर रचवाकर चप्पल पहनकर दुल्हनिया बनकर हवेली आयी है चुन्ना बोला l
अच्छा मेरा चप्पल देखकर दिल पर सांप लोट गया क्या ?कुछ तो शरम करते चुन्ना बाबू माँ बोली थी l
जाति चमार की महावर रचाकर हवेली आ रही है रानी बनकर,शरम तो तुमको आनी चाहिए चुन्ना बोलाl
डूब मरो चुल्लू भर पानी में तुम्हारी माँ की उम्र की हूँ, मेरी बेइज्जती कर रहे हो माँ बोली l
क्या करुं तेरी आरती उतारू चुन्ना बोला l
काश अपनी माँ की आरती उतारे होते तो औरत जाति की इज्जत करना सीख गए होते माँ भी गुस्से बोली थी l
इतने में बूढ़ी मालकिन आ गयी और बोली क्यों काँव-काँव कर रही हो देवराजिया?
मैं मालकिन नहीं, ये चुन्नाबाबू बउरा गए हैं,मक्खी जैसे मेरे पाँव की घाव पर भिनभिना रहे हैं l
क्या बकवास कर रही हो देवराजिया बूढ़ी मालकिन बोली?
बकवास नहीं सच कह रही हूँ lठीक सुनी हो मालकिन,मक्खी घाव पर बैठने नहीं दें रही हूँ,शुकर मनाओ हाथ नहीं उठा रही हूँ, लाज निभा रही हूँ, जहर का घूँट पीकर lहाथ उठ गया तो मक्खी की भिनभिनाहट बंद हो जाएगी देवरजिया बोली l
इतने में चाभियों का गुच्छा कमर का कमरे में खोंसते हुए छोटी मालकिन आ गई और चिल्लाकर बोली ये देवरजिया का बक रही है चुन्नासिंग क्या हो गया?
बड़ी माँ साहब खुद देख लो चुन्ना बोला?
देख लूँ? क्या देख लूँ चुन्नासिंग छोटी मालकिन पूछी ?
चमाइन का पैर चुन्ना बोला?
देवरजिया एक हाथ में चप्पल उठाकर,एक पैर का पंजा तनिक उपर कर मालकिन को दिखाते हुए बोली देख लो l
क्या तुम्हारा चप्पल देखूँ बोली?
अरे मालकिन इतनी हिम्मत कहाँ माँ बोली थी?
इतनी हिम्मत कम है क्या मालकिन बोली?
सच कहा है अंनहरे के आगे रोओ आपन दिदा खोओ l अरे मालकिन भात जैसा मेरे पैर के पंजे नहीं सूझ रहे, अखिया पर मोटका चशमवा लगा कर देखोगी तो साफ-साफ दिख जायेगा?
इतने में चुन्ना बोला अरे बड़ी माँसाहिबा महावर रचा पैर,नया चप्पल देखो देवरजिया तेरी ये हिम्मत तू हवेली को चप्पल दिखाने आयी हो, माँ कुछ बोलती केशव अलका को बताया l
इतने फिर चुन्ना बोला, इस देवरजिया की हिम्मत देखो पांव की महावर और नया चप्पल दिखाने हवेली आयी है, धान रोपने नहीं गयी l
मालकिन कौवे को बोलो अपनी चोंच बंद करे मां भी गुस्से बोली थी l
चुन्नासिंग मुंह बंद रखो तनिक, देवराजिया क्या कह रही है, इसकी तो सुन लूँ बूढ़ी मालकिन बोली l
मालकिन पानी में बिआ उखाड़ते, ढ़ोते और धान रोपते-रोपते पैर के अंगूठा से लेकर कमर तक और दोनों हाथों की केहुनि के उपर तक सड़ गया हैl जमींदार बाबू ना जाने कौन-कौन सी खाद डालते हैं कि खेत उबलने लगता है l बाबू लोग मजदूरों को आदमी नहीं मशीन समझते हैं l देखो मालकिन पाँव से मवाद बह रहा है l पूरे शरीर में खुजली चल रही है l रात में पैर का बत्तीजार की हूँ l पनही क्या पहन ली कि हवेली में खलबली मच गयी माँ ऊँची आवाज़ में बोली केशव जैसे अलका को आँखों देखा हाल सुना रहा हो l
माँ की आवाज सुनकर तिलमिला कर चुन्ना बोला-सुन लिया बड़ी माँ साहिब, अब देवरजिया नेता बन रही है l दिल्ली में काशीराम मायावती को प्रधानमंत्री बनाने की तैयारी में जुटे हैं,अपना मज़दूर तीरथराम अपनी घरवाली देवरजिया को गांव का प्रधान l
मालकिन तुम क्या जानों बत्तीजार? चुन्नाबाबू तुम्हारे मुंह में घी शक़्कर, देर से ही सही पर हम इक्षावाकु और सूर्यवंशी क्षत्रियों का राज आएगा l ठकुराइन मेरी मज़दूरी तौलो, मेरे पांव के तालुओं से देखो मवाद निकलने लगा है अब खड़ा रहने में दर्द होने लगा है माँ बोली तो चुन्ना ऐंठते हुए बोला-अरे भविष्य की ग्राम प्रधान, देवराजी साहिबा का पैर खड़े-खड़े दर्द करने लगा,मचिया ला दूँ क्या?
तुम्हारी मचिया तुम्हें मुबारक़, मेरी मजदूरी मुझे l चुन्नाबाबू हवेली के बाहर मुंहजोरी किसी दबंग से करने की गलती मत कर देना वरना कोई ऎसे गला दबा देगा कि कभी बदतमीजी नहीं कर पाओगे मै बोली l
देवरजिया धमकी दे रही हो चुन्ना बोला l
अपनी औकात कहाँ? मालकिन पिछले पंद्रह दिन कि मज़दूरी बाकी है तौल दो, क्यों बत्तीजार को छिलवा रही हो मालकिन माँ आँचल से आंसू पोंछते हुए बोली l
छोटी ठकुराइन बात का रुख मोड़ते हुए बोली-चुन्नासिंग देखो बूंदाबांदी शुरू हो गयी है, तुम छाता लगाकर,एक और छाता बड़े बाबूसाहेब के लिए लेकर तुरंत खेत जाओ, बाबूसाहेब को घर भेज देना,ध्यान रखना मज़दूरों से झगड़ा नहीं करना l बाबूसाहेब कि दवाई का समय हो गया है l जल्दी जाओ चुन्नाबाबू छोटी मालकिन बोली l
बड़ी मालकिन बोली-देवरजिया अपनी पनही दूर निकाल कर आओ l मज़दूरी छोटी मालकिन तौल देंगी l छोटी मालकिन मज़दूरी तौलने लगी l वहीं मचिया पर बूढ़ी मालकिन बैठ गयी और माँ से पूछी तुमने
सड़े हुए पैर के घाव पर जलती हुई तेल की बाती से बत्तीजार किया है l
हाँ मालकिन बत्तीजार तो ऐसे ही होता है माँ बतायी थी l
अनाज की मज़दूरी तौलते हुए छोटी मालकिन बोली सड़ रहे पैर को तुमने बत्तीजार कर जला डाला l
खुजली तो कम हो गयी पर मेरी पनही से हवेली और चुन्ना बाबू जमीदराहट सुलग गयी कहते हुए माँ की आँखों से आंसू जमीन पर गिरने लगे l वह आंसुओ को रोकते हुए बोली पूरी तौलो l मजदूरी सड़ा अनाज गाँठ भूसी देखो?मालकिन दो किलो दिन भर की कमाई के लिए देख रही हो हाथ-पैर से रिसता मवाद l हक की मज़दूरी तो मत मारो माँ छोटी मालकिन से नाराजगी के अंदाज में बोली थी, केशव पत्नी अलका से बताते हुए रो रहा था l
देवरजिया बक-बक मत कर l मज़दूरी ले घर जा l बत्तीजार की जगह नीम की खुट्ठी पत्थर पर पानी के साथ रगड़कर लगाना, पका हुआ घाव धीरे -धीरे ठीक हो जायेगा मालकिन बोली l
मालूम है मालकिन l बत्तीजार कर देने से घाव बढ़ेगा नहीं मालकिन माँ बोली थी और मजदूरी मेँ मिले अनाज की गठरी सिर पर उठाकर घर की ओर चल पड़ी l माँ के आंसू हवेली की चौखट पर गिरे थे l घर आकर गठरी रखकर आंसू ही थी एक परजीवी भिखारी माथे पर लम्बा चौड़ा टिका लगाए आ धमका और बोला कुछ दान कर दो l अगला जन्म सुधर जायेगा l माँ गुस्से में तो थी ही इस जन्म का दुश्मन परजीवी भिखारी आया है मेहनत मजदूरी की कमाई लूटने,जा भाग रहा है कुंचा उठाऊं कहते हुए माँ झाड़ू की ओर लपकी, इतने टिका वाला परजीवी भाग खड़ा हुआ l
मैं स्कूल गया था l बड़ी बहन देविका घास काटने गयी थीl मैं स्कूल गया था l घर पर छोटी बहन शिल्पा थीl हवेली में मिले दर्ड से माँ दुखी थी l माँ के आँखों से तरतर आंसू चल रहे थे l शिल्पा माँ को लोटे का पानी देते हुए पूछी थी माई क्यों रो रही हो?
बिटिया मेरा चप्पल हवेली के गाल पर पड़ गया था,जमींदार का बिगडैल बेटा चुन्ना मजबूर की इज्जत को तार- तार कर दिया, छोटी शिल्पा की समझ में कुछ नही आया, जब मैं स्कूल से आया तो शिल्पा ने मुझे सब बताया और भैया माई रो भी रही थी l
क्यों मैंने शिल्पा से पूछा?
शिल्पा बतायी कि माई हवेली मजदूरी लेने गयी थी l माई रात में बत्तीजार की थी l चप्पल पहन कर कर हवेली गयी थी l माई का चप्पल देखकर चुन्ना सिंग को सांप डंस लिया वह माई के साथ बदसलूकी किया हैं गाली दिया है l बहन की बात सुनकर मेरा खून खौल उठा मैं माँ से बोला हवेली जा रहा हूँ l l
मेरी कसम केशव तू हवेली ना जा l यह चुन्ना अपने सगे को नहीं छोड़ा l बेटा वह बदमाश हमारा क्या होगा? गूंगो -बहरों और शोषण -अत्याचार स्वार्थ की आँखों पट्टी बांधे खून चूसने वालों की कचहरी में कोई नहीं सुनेगा फरियाद मत जा बेटा माँ बोली थी l
माँ की कसम ने मुझे पत्थर की मूर्ति बना दिया केशव बोला l
चुन्ना ने अपने भाई का घर कैसे बर्बाद कर दिया अलका पूछी l
चुन्ना के दो और भाई उन्नीसिंग, सुन्नी सिंग और एक बहन है-मुन्नी l उन्नी सिंग चारों में सबसे बड़ा था l सबसे छोटा चुन्नी सिंग और एक नम्बर का बदमाश l उन्नीसिंग की शादी के बाद दुल्हन आते ही जोर जबरदस्ती शुरू कर दिया लिए चुन्नासिंग की जोरजबरदस्ती से तंग आकर मायके चली गयी, फिर कभी नहीं आयी l बेचारा उन्नी पागल हो गया एक हार्ट अटैक से मर गया l ऐसी तो चुन्नी की कहानी है l
बाप रे ये चुन्नी तो बड़ा कातिल है lसासुमाँ ने ठीक कियाl कोई अनहोनी टल गयी l खुंखार कातिल की मांद में जोखिम था अलका बोली l
चुन्नी है,नहीं था l भाई का जीवन बर्बाद करने वाले चुन्नी को कई साल बाद किसी बड़े बदमाश ने बीच सड़क पर ऐसे टपका दिया कि किसी को पता ही नहीं चला l
उस वक्त माँ आंसू पोछते हुए बोली थी बेटा संतोष का फल मीठा होता है l पानी में रहकर मगरमच्छ से दुश्मनी कैसे? माँ ने मेरे सिर पर हाथ रखकर कहा था बचवा पढ-लिख कर तरक्की करना l अपने और शेशव के परिवार को ऐसा बना देना कि फिर कभी बत्तीजार ना करना पड़े l
मैंने माँ से संकल्प लिया l माँ-बाप के आशीर्वाद से संकल्प पूरा हुआ केशव बोला l
हवेली माटी में मिल गयी, हवेली वालों को बत्तीजार करने के लिए तेल-बात्ती पाने का भाग्य रूठ गयाl तुम्हारे शैशव भैया ने कौन सा भैय्यपन निभाये,उनके बेटवा के लिए तुम बाप की तरह पुल बने वही शैशव बाबू पीठ में खंजर उतार दिए l
शैशव बाबू की पुत्रबहू ना जाने ऐसा कौन सा जादू कर दी कि सास-ससुर, ननद और खुद उसका पति बंता खुद अपनी पत्नी का गुलाम बन गया, अपना उपकार बिसार दिए सब, अब तो कोई बात तक नहीं करते, अपने पाले -पोसे कितने पराये हो गये, ऐसे खून के रिश्तेदारों से तो अच्छे पराये हैं l अपने बच्चों के हक काटे अपनी जरूरतें पूरी नहीं किये, भाई और उनके परिवारजनों की जरूरतें पूरी किये l वक्त क्या बदला हम पराये-अजनवी हो गए l क्या मिला भगीरथी प्रयास का.......अशोक के पापा अलका बोली l
मोहतरमा,बत्तीजार का दर्द l करने और सहने का सामर्थ्य था किये और सहे l एक परिवार को अपने बेटी-बेटा जैसा पाले-पोसे,पढ़ाये-लिखाये, तरक्की की राह पहुंचाए lतरक्की के मद में वे बउरा तो इसमें हमारा क्या दोष? वे लोग हम लोगों की नेकी को विसार दिए तो हम लोग नेकी कर क्यों दुखी हो? हमने अपना नैतिक फ़र्ज निभायाl भैय्यपन निभाया l कोई बुराई तो किये नहीं l अच्छाई किये हैं l हम भूला देते तो सुखी रहेगे l
अलका तुम कहती हो मैं कंजूस हूँ, सही भी है, परिवार को तरक्की के रास्ते पर ले जाने के लिए संघर्षरत, ना तुम्हारा शौक पूरा कर पाया ना खुद का l जानती हो मैंने दिल्ली के आज़ादपुर में सड़क के किनारे बिकने वाले पुराने कपड़े बीस रूपये पच्चीस रूपये में खरीद कर पहन कर अधिकारी तक पहुँचा हूँ l भाई ने भी रिश्ते को धकिया दिया है दो भाईयों के कुनबा को तरक्की के रास्ते पर लाने मैं तो सफल हो गया, मुझे लगता है मैं विफल हो गया हूँ l
अरे अब रहने दो रुलाओगे क्या अलका बोली?
माँ-बाप के बत्तीजार का दर्द उनके साथ गया पर माँ-बाप के आशीर्वाद से अपने कुनबे को बत्तीजार के दर्द का सामना भविष्य में तो नहीं करना पड़ेगा l केशव और अलका बातचीत कर ही रहे थे कि स्वामीनाथ बाबा आ गए और पूछे बेटवा किसको गोड़ खुल हो गया है कि बत्तीजार करना पड़ रहा है l
बाबा वीरनाथ जमींदार की हवेली को अलका बोली l
बिटिया हवेली को नासूर हो गया है, बत्तीजार इलाज कारगर नहीं है स्वामीनाथ बाबा बोले l
हाँ बाबा ठीक कह रहे हैं अलका बोली l
बिटिया तीरथ और देवराजी के बत्तीजार ने अपने परिवार सारे दुःख-दर्द हरकर बस्ती के लिए नजीर खड़ी कर चले गएl बेटा केशव तुमने बाप के सपने सुनहरा रंग भर दिया स्वामीनाथ बाबा बोले l
सासुमाँ के बत्तीजार के दर्द पर अशोक के पापा याद कर आंसू गार रहे हैं अलका बोली l
बेटा खत्म तो हो अंग्रेजों का साम्राज्य जिनके राज्य में सूरज नही डूबता है l शोषकों का राज तो ख़त्म ही होना था, अब तो अत्याचारियों का चूल्हा भी गर्म करने में नानी याद आने लगी है l लुटेरों का भी आतंक ख़त्म हो गया l आसमान छूने का वक्त आ गया है l खूब तरक्की करो माँ-बाप को कभी मत भूलना l माँ-बाप मरकर भी धड़कन में बसते हैं l मां-को याद रखना शुभ संकेत है lबहुत बढ़िया बेटा खूब आगे बढ़ोगे स्वामीनाथ बाबा बोले l
हाँ बाबा माँ-बाप के बत्तीजार को कैसे भूल सकता हूँ l कैसे भूल सकता हूँ माँ-बाप के बत्तीजार का दर्द केशव बोला l
शाबाश केशव बेटा, कुटुंब-गांव का नाम रोशन करो,खूब तरक्की करो मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है,स्वामीनाथ बाबा कहते हुए ऐसे गए कि फिर कभी ना लौटे l
नन्दलाल भारती
15/03/2025
समाप्त l
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