Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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त से तलवा

 

 त से तलवा 


अभिलाषा के बाबू कोई परेशानी है क्या? रात भर करवटें बदलते रहे ना सोये ना सोने दिए l ऐसी मुझसे क्या खता हो गई l उर्मिलाजी पति सागर के गले में बांहे डालकर बोलीं l

उर्मिलादेवी कुछ ऐसी यादें होती हैं,जो सोने नहीं देती l

मेरे अलावा और कोई चुड़ैल बसी है क्या तुम्हारी यादों में l मैं चुड़ैल का खून पी जाऊँगी l

ऐसा अपराध करने की नौबत नहीं आएगी उर्मिलाजी सागर बोला

नाम बताओ जल्दी,उर्मिलाजी अपने सिर पर सागर का हाथ रखते हुए पूछी?

सच सकोगी उर्मिलाजी?

दरोगाजी की बेटी हूँ, इतनी तो हिम्मत है l

सुनो बस इतना ही सागर बोल पाया कि उसकी आँखो से आंसू रिस कर उर्मिला की बांहों पर टपकने लगे l

ये क्या तुम रो रहे हो उर्मिला बोलीं l

नहीं....यार दिल की याद रिस गयी l

क्या उस चुड़ैल की याद इतनी गहरी हैंl उसका नाम बताओ उर्मिला l

हाँ उर्मिलाजी उसका नाम त अक्षर से शुरू होता है सागर बोला

उर्मिलाजी तनिक कड़क आवाज़ में पूछी बताओ l

त से तलवा कहते ही सागर की आँखे झराझर बरसने लगी l

रोने की क्या बात है l लोग तो तलवा चाट कर संतरी से मंत्री तक बनते जा रहे हैं l तुम चुड़ैल का सही-सही नाम बताओ l

सुन सकोगी, दर्दनाक याद है, यह वही है जिसने मुझे यहां तक पहुंचाया है l मेरे बाप के पैर के पंजे से लटकता तलवा सागर बोले l

अब क्या उर्मिला और सागर की आँखों से झरते आंसू एक हो रहे थे l तुम इश्क की चासनी में दर्द क्यों लपेट रहे थे l मैं जानती हूँ सास-ससुर जी ने बहुत दुःख उठाया है उर्मिला बोली l

पिताजी बच्चे से बूढ़े कब हो गए,उन्हें पता ही नहीं चला l वह भी अपने ही दादा-परदादा की जोर -जबरदस्ती से छिनी गई अपनी ही जमीन पर जमींदार का हल जोतते l मैं बाप के तलवे से उपजे आंसू में तपकर अफसर बनाl भाई और अपने परिवार को शिक्षित बनाने और पैर पर खड़ा करने में कलम घिसते-घिसते बूढ़ा हो गयाl इश्क क्या जीवन का सुख भोगने तक का वक़्त ही नहीं निकाल पाया l

देखो राज रोग की चपेट में बुरी तरह फंस गया l

देखो अखिल साहब का अफसर क्या बने,उनके माँ-बाप,बहन सब सब तरक्की की आंधी में गैर हो गए l मेरा बेटा आशीष खुद के भविष्य से बेखबर सास-ससुर और साले का भविष्य बनाने जुटा हुआ l मैं अपने बाप के तलवे को दिल से लगाए जी रहा हूँ सागर बोला l

फ़िक्र क्यों? नेकी ही तो किये हैंl भूल जाओ l परम् सत्ता पर भरोसा रखो, आशीष जरूर चेतेगा l अपनी तीनों औलादों -आशीष,आलोक,अभिलाषा और नाती-पोतों का अपने हिस्से का ही सुख मिल जाये बहुत होगा l और नहीं चाहिए ....... उर्मिला बोली l

जानती हो मेरे जीवन की स्कूली शिक्षा का प्रारम्भ ही दर्द से हुआ था l जाड़े की रात थी l दांत कड़कड़ा रहे थे l पिताजी ठाकुर सूरजभान के खेत में दिन भर हल जोतने के बाद देर रात तक हवेली की बेगारी करने के बाद घर आये और आते हो माँ बोली बहुत देर हो गयी आने में l जाओ हाथ -पैर धोकर कौड़ा तापते-तापते खाना खा लो l

आगे और कुछ सागर बोलता तब तक उर्मिला बोली तुम्हारे बचपन की बात मैं कैसे जान सकती हूँ l

आगे तो सुनो सागर बोला l

सुनाओ बचपन का किस्सा l

अरे तुम दरोगा की बिटिया हो मै हलवाह का बेटा l मेरे और तुम्हारे किस्से में कुछ तो अंतर होगा सागर बोला l

आगे तो बताओ क्या हुआ?

मैं मछली-भात खा रहा था सागर आगे और कुछ बोलता मैं भी मछली, भात और रोटी खाई हूँ l सागर टोंकते हुए बोला उर्मिला पूरी बात तो सुनो l

कहोगे तब तो सुनूंगी उर्मिला बोली l

सच रात मुझे नींद नहीं आई सागर l

मछली भात शरीर में इतनी गर्मी ला दिया था कि दांत कड़कड़ा देने वाली रात में नींद नहीं आई l

अरे नहीं भाग्यवान पिताजी गोबरही खांची पर बैठकर पैर सेंक रहे थे l

इसमें नींद उड़ा देने वाली ऐसी क्या बात थी उर्मिला बोली l

बात थी आँखों में आंसू ला देने वाली और सचमुच सागर की आँखे झर पड़ी l

बाप रे बाबूजी के पांव में ऐसा क्या l

पांव नहीं तलवे की बात कर रहा हूँ सागर बोला l

बताओ मेरी भी आँखे पसीजने लगी है उर्मिला बोली l

जाओ पानी पीओ और मुँह धोकर आओ l कुछ मिनट के लिये मौन रखना चाहता हूँ l हाँ मेरे लिए भी एक गिलास पानी लाना सागर बोला l

जैसा कहो उर्मिला चली l

सागर गिलास का पानी पेट में उतारा तनिक राहत की सांस लेते हुए उर्मिला पिताजी का तलवा देखकर मैं घबरा गया l पिताजी के पंजे और तलवे के बीच जमें हुए खून की परत लग रही थी l तलवा पंजे को छोड़कर लटक रहा था l मुझसे मछली भात निगला ही नहीं जा रहा था l मैं तलवे और पंजे के बीच की खाली जगह देखकर डर गया l थाली लेकर उठा तो पिताजी बोले पूरा खाना खा लो l

मैंने बोला पेट भर गया l कई रात सोया नहीं l नींद नहीं आती थी l तब से आज तक पिताजी का तलवा नहीं भूला l गरीबी कितनी कठिन परीक्षा लेती है l पिताजी ठाकुर सूरजभान का हल जोतते तलवा साथ छोड़ देता था पर पिताजी ने कभी हार नहीं माना l

पिताजी सूरज उगने से पहले ठाकुर की हवेली चले जाते दिन भर खेतों में बैल की तरह खटते l हवेली पहुंचते तो ठाकुर बेगारी में फंसा लेते l देर रात तक बेगारी के बदले तनिक गांजा या कुछ बूंद दारू दोने में टपका देते lपिताजी सारा दुःख-दर्द भूलकर सारे दर्द और गम भूलकर सो जाते, और उठते ही उन्हें ठाकुर की हवेली दिखती l पिताजी ने बहुत दर्द झेला है l

अभिलाषा के बाबू बस करो कान फट जायेगा मेरा उर्मिला बोली

ना, माँ दुनिया में रही ना बाप पर माता-पिता का संघर्ष दिल-दिमाग़ से नहीं गया l इस हलवाही क्या गुलामी गुलामी के बदले ठाकुर ने दस बीसा खेत दिया था l इस खेत में आधा से अधिक गांव समाज की जगह थी l उस गांव समाज की जमीन को अब ठाकुर ने वृक्षारोपण के नाम पर हथिया लिया l गांव की धरोहर पोखरी भी ठाकुर की मिल्कीयत बन गयी है l

गांव के जमींदारों ने गांव समाज की जमीन अपने कब्जे ले रखा है l गांव के जमींदार आवन्टन आज तक नहीं होने दिए l भूमिहीन इक्कीसवीं सदी में भी आवन्टन का इंतजार कर रहे हैं l बेचारे मेरे पिताजी आजीवन दो सेर मज़दूरी के लिए जमींदार सूरजभान के गुलाम रहे, बख्सिश चिलम भर या तनिक चरस या बूंद चार बूंद अंग्रेजी दारू l

तभी नरभक्षियों का साम्राज्य खत्म हो गया, उनका सर्वनाश हो गया l सारी हवेलियां भूतही हो गयी हैं l हाशिये के लोगों की जमीन हथिया कर जमींदारों की औलादें वही बाप-दादा की लूट की जमीन बेंचकर अय्याशी कर रहे हैं सागर बोला l

वह दिन भी जल्दी आएगा, जब नरभक्षी लोग होटलों में बर्तन धोकर पेट भरेंगे उर्मिला आंसू पोंछते हुए बोली l

जमींदार ही नहीं ठकुराइन जोंक की तरह खून चूसने वाली थी l मज़दूरी में भी हेरा-फेरी कर देती थी l कंकड-पत्थर और सड़े-गले अनाज मिलाकर मज़दूरी देती थी l माँ कुछ बोलती तो ठकुराइन छिछकार देती l माँ बेचारी आंसू बहाती मज़दूरी का अनाज लेकर घर आती l हाथ से कुटती-पिसती, बनाती हम लोगों का पेट भरती l उर्मिला मैं अपने माँ-बाप का कर्ज का भार कभी उतार नहीं पाऊंगा l

अभिलाषा के बाबू तुम क्या ? कोई भी अपने माँ-बाप का कर्ज नहीं उतार पाया l अपने माँ-बाप को याद कर रहे हो, यही उनकी आत्मा को तार रहा होगा l एक तुम्हारे भाई साहब, जीवन में कुछ नहीं किये l तुम्हारी कमाई पर खुद पले-बढ़े, उनकी दोनों औलाद-अखिल और अदिति पले -बढ़े, ब्याह गौना सब किये, अब पांव क्या जमने लगे हैं कि हम लोग ही पराये हो गए हैं l

ससुरजी आखिरी दिनों में बिस्तर पर पड़े-पड़े बेहोशी की हालत में कुछ कह देते तो कलयुग के श्रवनकुमार तुम्हारे वारिधि भाई साहब,फस्ट एड डाक्टर जहर का इंजेक्शन लगाने को कहते l वारिधि साहब की घरवाली, अफसर अखिल की माताजी महुरीदेवी भी बहुत छिछकारती -दुत्कारती रहती थी,ताना-मेहना मारती थी अब बिना कुछ किये गद्दी पर बैठी है उर्मिला बोली l

वारिधि और महुरादेवी अपना कर्म किये, हम तुम अपना l उर्मिला सबको अपना-अपना करना और भरना है सागर बोला l

तुमने भी कम दुःख नहीं झेला है l सब जानती हूँ महापुरुष तभी तो तुम्हारी परछाई बनी हूँ उर्मिला बोली l

उर्मिला ठीक कह रही हो माता-पिता की ख्वाहिशे हमने पूरी करने की पूरी किया l क्या छूटा-क्या पूरा हुआ, यह तो उनकी आत्मा जाने पर शिक्षित और सम्पन्न की आधारशिला, शान और आत्मविश्वास के साथ तो ख़डी हो गई हो

एक शोषित माता-पिता को और क्या चाहिए उर्मिला बोली l

माता-पिता भगवान हैं, वे न होकर भी मेरे लहू में प्रवाहित हैं पर उर्मिला वह नहीं भूल पाउँगा l

वह क्या ? मतलबपरस्त वारिधि,महुरी और अखिल को l क्या किया ? क्या नहीं किया? सब भूला दो उर्मिला बोली l

नेकी करो, दरिया में फेंक l मैंने माता-पिता की ख्वाहिश और अपना नैतिकदायित्व पूरा किया है l क्यों याद रखूंगा?

कौन सी अनमोल याद है जो नहीं भूला सकगो उर्मिला पूछी?

वही याद जिसने मुश्किलों से लड़ना आगे बढ़ना सिखाया l

बता दो महापुरुष उर्मिला पूछी l

उर्मिला को गले लगाकर,अपनी आंसूओं रुमाल में सहेजते हुए सागर बोला वही पुरानी याद - त से तलवा l

नन्दलाल भारती

03/03/2025














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