Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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तुम लौट आओ

 
तुम लौट आओ
मैं खड़ा कई मुसीबतों को ढोकर 
आज भी ढो रहा हूँ, तुम्हारी इंतजार में 
मैं वही तुम्हारा पैतृक घर हूँ 
जहां टिमतिमा थी, जुगुनू जैसी दीया 
डयोढ़ी  पर सजाती थी बूढ़ी माँ 
ना अब दीया है ना 
दीया सजाने वाले वे  हाथ 
हाँ मैं खड़ा हूँ इंतजार में 
जंग लगे ताले का भार थामे 
मेरा भार थामे खड़ा है ताला 
दीवारे चटकने  लगी है  
कबेलु टूटफूट रहे 
घोड़िया, बंचड़ी सड़-गल रहे हैं 
मैं घर हूँ तुम्हारा पैतृक 
जहां आँगन में था तुलसी का बिरवा 
बिरवा नहीं बचा है अब 
तुम परदेसी 
मैं तुम्हारी बाट ताक रहा हूँ..... मैं पैतृक घर हूँ l
किसके भरोसे कब तक टिक टिकूंगा 
किसी दिन वक्त झोंका ढकेल देगा 
मुझे..... चारों खाना चित 
मैं मिट जाऊँगा, तुम्हारी इंतजार में 
तुम्हारा अस्तित्व तुम्हारी पहचान 
तुम्हारे पुरखों की शान 
मुझे इंतजार हैं, उम्मीद है 
जल उठेगा  दीया 
चहक उठेगी पुरखों की मर्यादा 
मैं पा जाएगा वैभव पुराना 
रोशन हो जायेगा पैतृक गांव 
लहलहा उठेगा तुलसी का बिरवा 
तुम लौट आओ.... तुम लौट आओ l
नन्दलाल भारती
28/12/2025

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