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Dr. Srimati Tara Singh
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चूड़ियों का उपहार

 

चूड़ियों का उपहार

जयशरण मामूली खेतिहर कृषक थे,पत्नी दिव्यानी जयशरण का साथ कंधे से कन्धा मिलाकर दे रही थी l इस दम्पति का सपना था, उनकी औलादें शिक्षित बने, तरक्की करें जबकि जयशरण के पास न तो स्कूल जाने का कोई प्रमाण था न कोई कालेज, यूनिवर्सिटी की डिग्री, यही हाल दिव्यानी का भी था l पढ़ाई का प्रमाण पत्र होता भी कैसे उनको  धर्म ने शिक्षा से वंचित जो कर रखा था l धार्मिक गुलामी की बेड़ियों में जकड़ रखा था,इसके बाद भी जयशरण के माता-पिता खुले आसमान  उड़ान भरने के सपने देखते थे l वही ऊँचे ख्वाब  जयशरण के दिल मे भी  थेl जयशरण धुन के पक्के, जिद्दी और तनिक गुस्सैल भी थे  l शोषितों की अशिक्षा पर तो अंग्रेजो की नजर पड़ी, जिसके कारण हाशिये के लोगों के लिये शिक्षा के द्वार खुले थे l

जयशरण को न किसी का अपमान करना उन्हें पसंद था न सहना, सम्मान पर ऊँगली उठाने वालों की ऊँगली उखाड़ने की कुबत रखने वाले जयशरण आदमियत पसंद थे, दूसरों का सम्मान भी बड़ी शिद्द्त से करते थे l किसी के अपने करने पर आगबबूला हो जाते थे l 

दिव्यानी समझाने की कोशिश करती तो गर्व के साथ कहते मोहतरमा हल की मुठ पर करतब दिखाने,बैलों की पीठ पर हाथ फेरकर, काम आसान बनाने,माटी की कोख से अन्न पैदा करने वाले हाथ चूड़ियों वाले हाथ तो नहीं हो सकते l

दिव्यानी कहती अरे जीभ काढ़कर गुस्सा होने से, कोई फायदा होता है क्या? सोच-विचार सवाल-जबाब किया करो l

हाँ तुम ठीक कहती हो, पढ़ें-लिखो जैसा बातचीत नहीं कर सकता ना l हम ठेठ देहाती लोग सीधा- सच्चा जानते हैं नाक की सीध चलते हमारी बोलचाल में मिलावट नहीं हो सकती l हम ठेठ देहातियों का व्यवहार और जीवन सच्चा होता है जयशरण अपनी सफाई में कहता l

क्या मैं तुमको नहीं जानती l मुझे क्यों सफाई दे रहे हो l अब पहले जैसे लोग नहीं रहे l अपने लोगों को लिखना-पढना तो आना चाहिए l

क्या अभिषेक नेता तुमको कितना सिखाया-पढ़ाया पर तुम अपना नाम नहीं लिख पायी l मुझे देखो दस्तख्त करना तो सीख गया l अब अगूंठा में स्याही तो नहीं पोतना पड़ता, काश तुम भी अपना नाम लिख गयी होती जयशरण बोला l

मैं नहीं बेटवा अभिषेक से लिख-पढ़ पायी, पढ़ी-लिखी बहू लाना, बहू से लिखना- पढना सीख जाऊँगीl तुम ठीक कह रहे हो अभिषेक के बाबू चूड़ी वाले हाथों में कलम लग गयी होती तो आज जैसी अपनी दशा ना होती दिव्यानी बोली l

बात तो सौ टके कह रही हो l भले ही बहू बीए पास न हो कुछ तो पढ़ी-लिखी हो,पढ़े लिख बाप की बेटी हो l

वाह क्या बात कर दिए ? पढ़ा लिखा बहू का बाप हो माँ नहीं  दिव्यानी नाराज होते हुए बोली l

भाग्यवान नाराज होने की बात नहीं हैl देखो अपने गांव में कितनी चूड़ियों वाले हाथ बीए पास शायद कोई नहीं l हम खुद स्कूली शिक्षा पूरी नहीं कर पाये तो समधन पढ़ी लिखी कैसे खोजेंगे l हाँ समधी पढ़ा-सरकारी नौकरी वाले बाप की पढ़ी-लिखी बिटिया अपने बेटवा प्रशांत की दुल्हनिया बन जाती तो बिटिया मनीषा को भी नई दिशा मिल जाती l अपने कुल का अभ्युदय हो जाता  जयशरण बोला l

शिक्षित तो सभी को होना चाहिए क्या लड़की क्या लड़की बात बहुत हो गई मैं रसोई में जा रही हूँ  कहते हुए दिव्यानी चल पड़ी लिए 

जयशरण बोला -तनिक ठहरो l

और नहीं ठहरूंगी lखाना नहीं खाओगे क्या? ख्वाबों के पुलाव से पेट भर जायेगा  l  मुँह को निवाला चूड़ियों वाले हाथों से ही मिलेंगे, और भी बहुत कुछ l देखो अपने देश की महान महारानी लक्ष्मीबाई, झलकरीबाई, फूलनदेवी,मायावती,सावित्रीबाई फुले,रमाबाई अम्बेडकर इनके भी तो चूड़ियों वाले हाथ थे, चूड़ियों वाले हाथों ने क्या कमाल किया है  दिव्यानी बोली l 

 देश की आजादी से लेकर सामाजिक विषमता के जंग में भी चूड़ियों वाले हाथों ने बहुत बड़ा योगदान और बलिदान दिया हैl घर-परिवार को फर्श से अर्श तक पूछाया है, कुछ ने तबाही भी मचायी है l मोहतरमा तुम्हारे चूड़ियों वाले हाथ मेरे परिवार  के उद्धार करने वाले हाथ साबित होगें l

दिव्यानी कहती,मे अकेले कुछ नहीं करने लायक हूँ,मैं तो तुम्हारी परछाई हूँ l

जयशरण कहता देवी हम दोनों मिलकर करेंगें? तुम्हारे चूड़ियों हाथ तो नसीब बदलने वाले हैl दोनों के हाथ मिलकर कमाल करेंगे l अपनी औलादों के हाथ में कलम की ताकत जब आएगी, भले दुनिया तुम्हें याद न करें, अपने गांव वाले कहेंगे वाह रे दिव्यानी के चूड़ियों वाले हाथ गांव का नाम रोशन कर दिए l 

क्यों चने की झाड़ पर चढ़ा रहे हो l आओ वादा करें साथ-चलेंगे टूटेंगे नहीं, दुःख-सुख साथ-साथ सहेंगे l

वादा तो सात जन्म का है l कर्म  ईमानदारी से कर रहे हैंl अरमान पूरे हो जाएं अपने जीवन में बस इतनी ही ख्वाहिश है दिव्यानी बोली 

जरूर पूरी होगी प्रशांत पढ-लिख कर साहब बन जाए l मनीषा की गृहस्थी जम जाए l हम लोगों के आँख ठेहुना का जोर बना रहेl पूरी बस्ती कहे जयशरण के हल पकड़ने वाले हाथ और दिव्यानी के चूड़ियों वाले हाथों ने बस्ती का नाम रोशन कर दिया  बस इतनी सी मेरी भी ख्वाहिश है  जयशरण बोला l

बातों के पुलाव से पेट नहीं भरेगा, रोटी की भी जरूरत होती है, प्रशांत भी स्कूल से आने में है, भूखा होगा दिव्यानी बोलीl

सब भूख मिटेगी बांहों में जोर बाकी हैl मेरे हाथों का श्रृंगार-जोर और तुम्हारे हाथों के श्रृंगार चूड़ियाँ सजी रहें l प्रशांत के हाथ के श्रृंगार कलम के जोर से उसके हिस्से का आसमान मिल जाए तो सब सुख इसी जन्म में मिल जायेगा जयशरण बोला l

समय करवट प्रशांत ग्रेजुएट हो गया l शहर की ओर रुख कर लिया l नौकरी मिलने में तो बहुत दिक्क़ते  आ रही थी l अब सिर्फ डिग्री की पढ़ाई से नौकरी मिलना कठिन था l प्रशांत अपनी ही मेहनत की कमाई से कौशल शिक्षा के प्रशिक्षण के सात उच्चशिक्षा भी हासिल कर  अफसर भी बन गया l l मनीषा का ब्याह गौना रजगज से सम्पन्न हुआ l मनीषा गृहस्थ जीवन में अच्छी तरह रच-बस गयी l अब प्रशांत के ब्याह बारी थी l प्रशांत बहन की डोली विदा करने के बाद अपनी गृहस्थी बसाने का संकल्प जो लिया था l 

बेटी को विदा करने के बाद जयशरण  प्रशांत का ब्याह करने के लिये पढ़ी-लिखी लड़की तलाशने में जुट गया l पास के गांव गोकुलपुर के मोहनबाबू और ज्योति की बेटी रेखा थी तो अल्पशिक्षित पर गृहकार्य में दक्ष रेखा, जयशरण को पसंद आ गयी l मोहनबाबू शिक्षित सरकारी विभाग में अफसर थे l पढ़ा लिखा अफसर समधी की बेटी रेखा प्रशांत की दुल्हनिया बनाने पर राजी हो गए l 

रेखा और प्रशांत की सहमति की किसी ने जरुरत नहीं समझी l रेखा और प्रशांत माता-पिता के फैसले के खिलाफ जा भी तो नहीं सकते थे l आख़िरकार बिना किसी मुहूर्त के विवाह भी संपन्न हो गया l रेखा लाल जोड़े और लाल-लाल चूड़ियों से भरे हाथों के साथ प्रशांत को गले लगा ली l दोनों एक दूसरे सात जन्म के लिये एक दूसरे कोई स्वीकार कर लिये l शेष छः जन्म का तो पता नहीं पर वर्तमान वैवाहिक पूरी तरह सफल l 

रेखा और प्रशांत की तीन संताने हुई -अरुण, श्रिया और वरुण l ये बचें पढ़-लिख कर तरक्की की राह पर चलते हुए, गृहस्थ जीवन में प्रवेश कर चुके थे  l मीनाक्षी का अरुण के साथ ब्याह बहुत दुःखदायी साबित हुआ था साठ बरस की उम्र पार कर चुके प्रशांत और रेखा के लिए डरावने सबूत थे l  असामाजिक माँ-बाप की बेटी मीनाक्षी अभिशाप जैसी हो गयी थी l इसके अलावा जीवन में सब कुछ करिने से चल रहा था l

प्रशांत के माँ बाप -जयशरण-दिव्यानी और रेखा के माँ बाप, मोहनबाबू और ज्योति स्वर्गवासी हो चुके थे l मोहनबाबू और ज्योति की मौत के बाद रेखा की सौतेली माँ ने रेखा के ही भाईयों क़ो मिलाकर रेखा को अबैध माँ-बाप की बेटी घोषित करवाकर मोहनबाबू की जमीन जायदाद से बेदखल घोषित करवाकर खुद वारिश बन गए l 

बाप की धनदौलत से रेखा को कुछ लेना तो नहीं था परन्तु सौतेली माँ और सगे भाईयों ने जिस तरह से रेखा को जैविक माता-पिता की सगी बेटी अबैध घोषित किया,करवाया, उसे शर्मनाक कहा जा सकता है l 

मानवतावादी प्रशांतबाबू के कलम के हाथों के भरोसे रेखा के चूड़ियों वाले हाथ, कानूनी दरवाजा न खटखटा कर माँ -बाप की सामाजिक प्रतिष्ठा बचा लिये परन्तु इसका रेखा को बड़ा मलाल था l बेचारी कानूनी तौर अपने ही माँ बाप की बेटी होने का अधिकार उसके भाईयों और सौतेली माँ ने छिन लिया था l

गृह कार्य में दक्ष, अल्पशिक्षित रेखा सास-ससुर के सपनों में पति मोहनबाबू के साथ मिलकर सुनहरे रंग भर दी  l मोहन और रेखा के तीनों बच्चे अरुण, श्रिया और वरुण अपने पांव जमीं पर टिका चुके थे l समाज में जयशरण और दिव्यानी के पुत्र एवं पुत्रबधु प्रशांतबाबू और रेखा खूब सम्मान अर्जित कर रहे थे l इसी बीच ना जाने कब और कैसे कर्मकांडीय परजीवीयों की चपेट में आकर कान भी फूकवा ली पर मोहनबाबू को भनक तक नहीं लगी l परजीवी किस्म के लोग मेहनत की कमाई कुतर रहे थे l

प्रशांतबाबू विषमतावादी धार्मिकता के खिलाफ थे l वे कहते जो धर्म विषमता, भेदभाव को बढ़ावा देता 

है वह धर्म नहीं पाखंड है l धार्मिक पाखंड पर महान दार्शनिक ईबी पेरियार ने तो ठीक ही कहा है - धर्म समाज में भेदभाव और अंधविश्वास पैदा करता हैl धर्म की वजह से ही समाज में महिलाओं और निचली जातियों का शोषण होता हैl भारतीय संविधान भी तो विषमतावाद की इजाजत नहीं देता l 

आध्यात्मिक प्रवृति के प्रशांत को जातीय एवं धार्मिक पाखंड सपने भी डराता और हाशिये पर झटकता नजर आता पर रेखा को परजीवीयों की संगत में ही परमानन्द की अनुभूति होती थी, वह पाखंडियों की कुनीति से जैसे अनभिज्ञ हो गयी थी जबकि यही पाखंड का जहर सदियों से समाज को विखंडित खुद धर्मसत्ता के डंडे से लूट-पीट रहा  था और आज विज्ञान के जमाने में पुरानी अकड़ कायम है l रेखा परजीवि

 महिलाओं के फेरे मेरे पड़कर अंधभक्तिन होने लगी थी l

सुबह बढ़ रही थी दोपहर ढल और शाम चढ़ रही थी,प्रशांत के परिचित श्रमण विचारधारा के केएस बाबू सपत्नी आ गए, रेखा ने आवभगत किया l दोनों मित्रों के विचार-विमर्श के बीच पाखंड का विषधर जीभ लपलपाने लगा l प्रशांतबाबू नें कह दिया,हमारे समाज की महिलाएं अगर बीड़ा उठा ले तो कर्मकांडीय परजीवीयों की लूट से मुक्ति मिल सकती है, नारी उत्थान एवं सामाजिक समानता को बढ़ावा मिल सकता है l दोस्त दुर्भाग्य की बात है कि हमारी महिलाएं तनिक भी कदम पीछे नहीं खींच रही है l जातिवादी धर्म की जय-जयकार अपने ही पैर में कुल्हाड़ी मार रही हैं l

केएस बाबू के जाते ही रेखा न रौद्र रुप धारण कर लिया वह असमानतावादी धर्म की तलवार भांजते हुए बोली श्रिया के बाबू तुम चाहते हो कि मैं पूजापाठ छोड़ दूँ l

हाँ छोड़ दो l कर्मकांड से लाभ नहीं हानि है -सामाजिक और आर्थिक भी, जो धर्म छुआछूत और नारी को अपवित्र कहे, ऐसे धर्म से नजदीकी क्यों ? बहिष्कार करो l मेहनत की कमाई से परजीवीयों का  पोषण क्यों ?  रेखाजी धार्मिक नहीं आध्यात्मिक बनो l

रेखा बोली - सरस्वती की मूर्ति घर में क्यों  रखे हो? बाहर फेंक दो l

प्रशांत अदब से बोला -देवीजी ये छत्तीस करोड़ देवी-देवताओं ने हम शोषितों का कोई उद्धार नहीं किया है बल्कि नुकसान किया है l हम जैसे शोषितों का विकास सिर्फ देश के संविधान एवं बाबासाहेब डॉ अम्बेडकर के त्याग की देन है l छत्तीस करोड़ वाले धर्म ने तो अछूत शोषितों का दमन ही करवाया है l जातिवादी धर्माधीशों से अच्छे तो गोरे ही थे, शिक्षा के द्वार शोषितों के लिये खोले और भी कुछ कल्याणकारी कदम उठाये थे l

फेंक दो ये मूर्ति रेखा बोलीं l

जी मोहतरमा जरूर  l ये मूर्तियां सजावट की वस्तुएँ हैं l दुनिया भर में सजी हुई हैं l इनको देवी-देवता मानना और परजीवीयों पर अपनी गाढ़ी कमाई लुटाना पाखंड है, नासमझी है , ईश्वर आराधना नहीं हैं l   भगवान निराकार है सर्वत्र है l पाखंड में तो बिल्कुल नहीं प्रशांत बोले l

पाखंड पर प्रशांतबाबू की टिप्पणी से  रेखाजी क्रोधित हो गयी l सख्त नाराजगी जाहिर करते हुए बोली तुम  चूड़ियाँ पहन लो l अब मैं जाऊँगी l

प्रशांतबाबू चुटकी लेते हुए पूछे कहाँ?

रुपये कमाई ,रेखाजी लाल-लाल चूड़ियों से सजा हाथ उठाते बोली l

मानवीय समता के पुजारी प्रशांतबाबू बोले रेखाजी ना परजीवीयों का पोषण कबूल है ना पाखंड और ना ही जातिवादी  धर्म l कबूल है तो आदमियत का धर्म जहां होती समता, दया शील l और भी कबूल है मेरी भाग्य रेखाजी कबूल रहेगा आखिरी सास तक तुम और  तुम्हारी चूड़ियों का मुस्कराता-खनकता गुलदस्ता l

नन्दलाल भारती

27/02/2025












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