कैसे जाऊं माई के गाँव
अपने सब बेगाने हुए.
सिमट गई बरगद की छाँव
अपने सब बेगाने हुए.
वो सुबह-सुबह खरके का जाना
रजनी गैया का रम्भाना
भोड़ी मार बछरू का पीना
भाईचारे पर कक्कू का जीना
खेतों में हिरन का पाँव
अपने सब बेगाने हुए.
तड़के उठ उपली पर लिट्टी
कलेवा बुनती माई-बिट्टी
भूनी मकई के संग मट्ठा
बाल मंडली के मौजू ठट्ठा
फिर कबड्डी-कबड्डी का दांव
अपने सब बेगाने हुए.
कृष्ण-सुदामा जैसे मितवा
और मचकती पनिहारिन गितवा
भगही में हर बच्चे की अस्मत
बादल पर टिकती किस्मत
गेह बना खरिहान पुलाव
अपने सब बेगाने हुए.
डा० रमा शंकर शुक्ल
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