अगर जन्म उत्सव है, तो मृत्यु महापर्व
पद्म - सा जगा मनुज साकार अपने चरण को
अमरता के रंग से रँगकर , प्राण को अपनी
पुतली सेबाँधकर रखना चाहता चिरकाल
ज्यों वायु में आलोक विचरण करता, शून्यता
में भरी होती आवाज , मगर मकड़ी के जाल में
बंदी मनुज के चतुर्दिक , ज्योतिपिंडों में रहता
ध्वंस भरा, जो अंधकार और प्रकाश से शक्ति
खींचकर पलता - बढता, जो निष्ठुर विधि से
पीड़ित जग के चराचर को, परिवर्तन के चक्रों में
पीसकर करदेता जर्जर, सेवा सौरभ से पूर्ण हृदय
को तिमिर की मदिरा पिलाकर शांतकर देता
दौड़ रहा जो महाकाल धरती के प्रांगण में
तरल अग्नि बनकर वह चिरकाल तक जीने
कीअनुमति प्राणी को नहीं देता
मनुज भलीभांति जानता, यह जीवन पानी का बुलबुला
मात्र है जो आज बनता, और कल फूट जाता फिर भी
मनुज चांद को आसमां से धरती पर उतारकर
अपनी गोद में बिठाकर खेलना चहता है सपनों में
देखा जिसे, उसेमन में उतारकर मिट्टी पर रखकर
गले लगाना चाहता है, मगर यह नहीं सोचता काल
की छाती से लिपटकर रहनेवालों को मौत बड़े शौक से
अपने स्तन का दूध पिलाकर मारती है, और नभ से
स्वर्ग - नरक की सुप्त प्रेरणाऍँ , महाकाल बनकर
नियति का निर्मम उपहास , इसी श्मशान मेंउड़ाती हैं
काया संग छाया, जीवन संग मृत्यु चलता है
सृजनता और नाश लिपटा – सोयारहता है
नाश , विध्वंश , मौन अंधेरा, जीवन का सच है
प्रकृति शक्ति चिह्न होकर भी महाकाल के आगे
निबल है, व्योम में ज्योतिर्मान ही रहे ग्रह, नक्षत्र
विद्युतगण सभी इसकी सत्ता को स्वीकारते हैं
नीरवता की गहराई में स्थापित इस देवी के समक्ष
तीनो लोक नत मस्तक हैं,सृष्टि के कण-कण में छिपी
यही एक सत्य है,जो कुरूप होकर भी नित्य रहस्य है
कहते हैं गंगा का उदगम ज्यों हिमालय है
जन्म का उदगम श्मशान है,अपना घनत्व खोकर
मनुज नव रूपों को धारण करने यहीं आते हैं
यहीं परजीवन का करुण क्रंदन , चीत्कारें
भाव जगत को छूकर मर्म गीतों में ढलतेहैं
फिर भी देखते ही श्मशानको, मानसकी
पलकें विस्मित क्यों हो जाती हैं, हाथ - पाँव
फूलने क्यों लगते हैं, तनके सम्पूर्ण रोंगटे
खड़े क्यों हो जाते हैं, जब कि अमरता को
पाने हम जीवन भर सतत आराध्य उपासना
में लगे रहते हैं, वही अमरता तो हमेंइस
श्मशान की मिट्टी में सनकर मिलता है
घोर तम मे छिपा प्रकाश्, इसे ही तो हम कहते हैं
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