Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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उसका पावन मन देखा है

 

उसका पावन मन देखा है
सितारों को ओढ़े कफ़न देखा है
कैसे कोई भरोसा करे किसी पर
दोस्त सा न कभी , दुश्मन देखा है
चाहत का हर फ़ूल खिले जहाँ
ऐसा न कोई , चमन देखा है
इस रंग बदलती दुनिया में
अपनों का परायापन (बेगानापन) देखा है
कभी फ़ूलों से झड़ती आग, कभी
चाँदनी में , दहकता गगन देखा है

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