Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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माँ की पोटली

 

रह रहा हूँ दूर बहुत माँ,
जब भी मुझसे मिलने आना,
जहां बीता हैं बचपन मेरा,
उस आँगन की धूप लेती आना,
दिशा दिशा से आती खूशबू घर की,
अपनी पोटली देखो कहीं तुम भूल न जाना,
अकेलेपन का भँवर है यहाँ पर,
तुम अपनी गोद का दुलार लेती आना,
भूखी हैं आत्मा मेरी बहुत समय से,
तुम अपने हाथों का पका, खाना लेती आना,
दूर दूर तक खड़ी हैं, बड़ी बड़ी इमारतें यहाँ,
तुम अपने शहर की थोड़ी हरियाली लेती आना,
बेरंग नज़र आता है यहाँ सब मुझे,
तुम अपने बगीचे के फूलों का गुलदस्ता लेती आना,
यहाँ की गलियों में भी होता है शोर बहुत,
पर तुम घर की गलियों की चहलकदमी लेती आना,
यहाँ की कोयल भी मुझे नहीं लगती मधुर,
तुम घर की मुंडेर पर बैठे कौओं का शोर ही लेती आना,
यहाँ की छत से भी दिखता हैं आकाश मगर,
पर तुम घर की छत से दिखता चाँद लेती आना,
धूँधला रही है मुश्किलों से मंजिल मेरे सपनों की,
आसान हो जाये सफर, ऐसी दुआ लेती आना,
दिशा दिशा से आती खुशबू घर की,
अपनी पोटली देखो कहीं तुम भूल न जाना,
रह रहा हूँ दूर बहुत माँ,
जब भी मुझसे मिलने आना,
जहां बीता हैं बचपन मेरा,
उस आँगन की धूप लेती आना।

 

 

 

Neha Atri

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