Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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क्रांदित स्वप्न

 

तुम आ गई हो द्वारे लिपटी
साँझ की दुल्हन बनी।
उस अमावस की घटा में
आज है पूनम खिली।

 

पलती थी पलक़ों में सुनो
आज आँसू बन गिरी
स्वप्न अंतिम प्रहर में भी
तुमसे उम्मीद है मरी

 

तुम गीत बन के आगई हो
जुबान पर छाने लगी।
मुझको झूठी दुनिया देकर
तुम तो कहीं जाने लगी

 

फिर कविता सौंपी गीत सौंपे
दुःख जहां के बाँटने लगी
पल्लू जो तेरा मैंने है पकड़ा
तुम पलट के डाँटने लगी

 

हाय ये बैरी स्वप्न आता
है रात्रि अंतिम प्रहर में
देकर यादों का गुलिस्तां
लौटता है अपने घर में

 

 


©प्रणव मिश्र'तेजस'

 

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