समझ से परे थे,
या तलबगार थे,
ज़हनी मेहनत के,
या नहीं निकले,
उनके अपनों की,
किसी जरुरत के ।
वो तो निकले थे,
किसी मज़दूर की,
दिमागी उपज से,
नहीं थी कमतर,
उनकी अहमियत,
होने को थे इससे,
शायद किसी के,
अधूरे अरमान पूरे ।
वो काट सकते थे,
सुर्ख लाल फीते,
बड़े हुऐ थे जो,
उनका लहू सोखे,
मज़बूत हो चुके थे,
पाश की तरह,
और मददगार थे,
बढ़ाने को क्रन्दन,
मूक बंधी संस्कृति के ।
बे-रहम करते रहे,
नि:शब्द चुप चाप,
भ्रूण हत्या का पाप,
उन ख़्यालात का,
जो नहीं थे उनके,
किसी भी काम के ।
' रवीन्द्र '
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