सुना करते थे कि दीवारों के कान होते हैं । आजकल नया ज़माना है जिसमें उन्नत तक़नीक़ का प्रयोग करके दीवारें बोलने भी लगीं है । बोलना ही क्यों, देखना भी शुरू कर दिया है दीवारों ने । वक़्त की कमी या बीच की दूरियाँ बे-मायने हो गयीं हैं । सभी सामाजिक और उम्र के दायरों से परे है ये दीवारें । रिश्ते बनाती हैं और उन्हें बड़ी शिद्दत से निभाती भी हैं । सभी पर्व, त्यौहार, राष्ट्रीय महत्व के उत्सव इन दीवारों के बिना अब नहीं मनाये जा सकते । रिश्तों के बीच खड़ी दीवार को गिराने का उत्तम तरीक़ा है, दीवार के पास जाएँ और उसे दिल की बात साफ़ साफ़ बता दें । दूसरी और से कोई ठीक ठीक समझ लेगा और दीवारों के बीच की दीवार आसानी से गिर जाएगी। अभी तो ये दीवारें और भी सशक्त होने वाली हैं । एक घर की चार दीवारी में उपस्थित परिवार जनों के बीच वार्ता इन्हीं दीवारों माध्यम से होगीं । प्रति व्यक्ति एक दीवार की दर से देश में ऐसी कितनी दीवारें खड़ी होंगीं, यह तो वक़्त ही बतलायेगा । देखना यह है कि वो ज़मीन जिस पर ये दीवारें तामीर हो रहीं हैं किसके हिस्से में आयेगी । क्या इस ज़मीन पर हमारा भी कुछ मालिकाना हक़ रहेगा ?
' रवीन्द्र '
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