चंचल चितवन हर पल हर्षाती,
अक्सर ख्वाबों में आ आती,
नित - नित नूतन रूप दिखाती,
स्यामल गौरी तब खूब लुभाती.
प्यार भरा उसकी चितवन में,
मस्ती उसकी हर हरकत में,
बिना छुए ही कोमलता से,
दिल को गहरे से छू जाती.
पकड़न दौड़े तो पकड़ न आती,
ना चाहे तो निकट आ जाती,
जब तब देखो नाच नचाती,
स्यामल गौरी मोहे भटकाती.
जब मैं जगता वो सो जाती,
मैं सोता तो वो जग जाती,
गलत राह से सदा बचाती,
जीने की सच्ची कला सिखाती.
चोले बदले और चेहरे बदले,
मैंने घर के सब अपने बदले,
लेकिन उसको बदल ना पाया,
वो वैसे ही मुझे अपनाती.
मैं ही उसको समझ ना पाया,
पा कर भी उसको बिसराया,
जग के रस में उसे भुलाया,
सब कुछ खोया तब यह पाया,
मेरा अपना क्या है जग में ,
सब तो उसका ही जीवन में,
बिन मांगे ही वो प्रेम लुटाती,
स्यामल गौरी अब मन भाती.
'रवीन्द्र'
मुंबई
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