Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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आधुनिक

 
आधुनिक

क्या जिंदगी आधुनिक हो गई 
अब कोई नहीं देखता 
दीवार पर धूप आने का  समय
पूछने का किसी के पास समय नहीं  
क्या जिंदगी आधुनिक हो गई।

पांव छूना तो जैसे खड़ा हो 
विलुप्ति की कगार पर 
काम के बोझ तले  थके बुजुर्गो के पग  
नहीं दबाए जाते अब क्यों 
क्या जिंदगी आधुनिक हो गई।

चश्मे के  नम्बर बढ़ गए 
सुई में धागा नहीं डलता
कांप रहे हाथ कोई मदद नहीं 
बूढ़ों को संग ले जाने में 
शर्म हुई पागल अब क्यों 
क्या जिंदगी आधुनिक हो गई।

घर के पिछवाड़े से
आती बुजुर्गो की खांसी की आवाजें 
कोई सुध लेने वाला क्यों नहीं 
संयुक्त दीखते परिवार 
मगर लगता अकेलापन 
कुछ खाने की लालसा
मगर कहने में संकोच  क्यों   
क्या जिंदगी आधुनिक हो गई।

बुजुर्गो का आशीर्वाद /सलाह /अनुभव
पर लगा हो भाग  दौड़ भरी जिंदगी में  जंग 
उनके पास बैठ बतियाने  का समय क्यों नहीं 
गुमसुम से बैठे पार्क में 
और अकेले जाते धार्मिक स्थान अब क्यों  
क्या जिंदगी आधुनिक हो गई।

बुजुर्ग है तो रिश्ते है ,नाम है , पहचान है 
अगर बुजुर्ग नहीं तो
बच्चों की  कहानियां बेजान है 
ख्याल ,आदर सम्मान को
लोग  करने लगे नजर अंदाज अब क्यों  
क्या जिंदगी आधुनिक हो गई।

संजय वर्मा "दृष्टि "
मनावर जिला धार मप्र
9893070756

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