Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
Administrator

प्रतीक्षा

 
प्रतीक्षा

प्रतीक्षा होती द्वार पर
वृक्ष के नीचे
पलकों के झपकने पर
पथरा जाती आंखे
प्रतीक्षा रूठने का काम करती
प्रतीक्षा रथ  का रथ जो
चलता नहीं बल्कि
राहगीरों में ढूंढता
अपनापन और अपने
उन्हीं अपनो में होती
प्रेयसी
जितनी प्रतीक्षा
फल उतना ही मीठा
तपती धूप
बरसता पानी
मौसम की फिक्र कहा
प्रतीक्षा एक तपस्या होती
जो सारा दिन और रात
कर लेती अपने पक्ष में
हाथों में रखे फूल
मुरझा जाते
प्रतीक्षा अनवरत क्रम जारी
प्रेम प्रस्फुटित  
निखर जाता
नयनों में आंसू लिए
प्रतीक्षा
तुम हमेशा प्रेम का 
आवरण पृष्ठ हो।

संजय वर्मा"दृष्टि"
मनावर जिला धार मप्र

Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY
हर उत्सव के अवसर पर उपयुक्त रचनाएँ