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स्वाध्याय की पठनीय पुस्तक

 
श्री कृष्णवचनामृतम गीता पर स्वाध्याय की पठनीय पुस्तक

लेखक वीरेंद्र सिंह द्वारा गीता पर स्वाध्याय " श्री कृष्णवचनामृतम "संस्करण में अर्जुनविषादयोग ,सांख्य योग,कर्मयोग ज्ञानकर्मसंन्यासयोग,कर्मसंन्यासयोग,आत्मसंयमयोग,ज्ञानविज्ञानयोग,अक्षरब्रह्मयोग,राज विद्याराजगुहायोग,विभूतियोग,विश्वरूपदर्शनयोग,भक्तियोग ,क्षेत्र- क्षेत्रज्ञ विभागयोग,गुणत्रय योग ,पुरषोत्तमयोग,देवासुर सम्पद्विभागयोग,श्रद्धात्रययोग ,मोक्षसन्यासयोग में भावार्थ ,व्याख्या बड़े ही सुंदर तरीके से की है| पुरोवाक्क में संस्कृत शब्द 'मीमांसा 'का अर्थ गहन,चिंतन और गंभीर विश्लेषण बताया जाकर स्वाध्याय के रूप में इस पुस्तक को रचा है| गीता है ही ऐसा ग्रंथ कि रचनाकार का मन लेखनी उठाने को लालायित हो जाता है | सैकड़ो रचनाकारों ने लेखकों ने, गीता पर लिखा है | सभी ने इसे 'भगवान का गीत ","गीत गोविंन्द का " कहा है| गीता का आरम्भ और अन्त 'शरणागति' में हुआ है|कर्मयोग,ज्ञानयोग और भक्ति योग ये तीन ही योग है| शरीर((अपरा) को ले कर कर्मयोग है | शरीरी(परा ) को ले कर भक्तियोग है | भगवान ने गीता के आरम्भ में पहले शरीरी को लेकर क्रमशः ज्ञानयोग और कर्मयोग का वर्णंन किया,फिर ध्यानयोग का वर्णन किया जो भगवान का मुख्य ध्येय है | मनुष्य कर्मयोग से जगत के लिए,ज्ञानयोग से अपने लिए और भक्तियोग से भगवान् के लिए उपयोगी हो जाता है |उपर्युक्त तीनों योगों के सिवाय यज्ञ ,दान,तप,,ध्यान,योग,प्राणायाम,हठयोग आदि साधनों का भी वर्णन किया गया है |आसक्ति के बारे में कहा गया  कि आसक्ति से कामना उतपन्न होती है | और  कामना में विघ्न पड़ने पर क्रोध उतपन्न होता है | क्रोध से मूढ़भाव हो जाता है |मूढ़भाव से स्मृति में भ्रम जाता है अर्थात ज्ञानशक्ति का नाश हो जाता है | बुद्धि का नाश होने से यह पुरुष अपनी स्थिति से गिर जाता है | जिस पुरुष की इन्द्रियाँ ,इन्द्रियों के विषय से सब प्रकार से निग्रह की हुई है ,उसी की बुद्धि स्थिर है | जो मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओं  को त्याग कर ममता रहित,अंधकार  रहित और स्पृहा रहित विचरता है, वही शान्ति प्राप्त होता है |विष्णु पुराण के तीसरे अध्याय में काल का स्वरूप दर्शाया  है |ब्रह्मा जी अपने परिमाण से उनकी आयु 100 वर्ष  कही जाती है| पृथ्वी,समुद्र,पर्वत आदि  चराचर जीव है उनकी  आयु का परिमाण किया  जाता है | पंद्रह निमेष को  काष्ठा  कहते है | तीस  काष्ठा  की एक कला  और तीस कला का  एक  मुहर्त होता है और तीस  मुहूर्त का एक दिन और रात होता है | उतने ही दिन रात का अर्थात 30 दिन -रात का दो पक्ष युक्त शुक्ळ पक्ष --कृष्ण पक्ष)  एक मास होता है | छः माह के एक अयन  की गणना से एक वर्ष में दो अयन  होते है दक्षिणायन और उत्तरायण | देवताओं का दिन उत्तरायण और रात दक्षिणायन होती है | दो अयन मिलकर एक वर्ष होता है|  मानवीय काल गणना म 360 दिन का अहोरात्र  होता है | देवताओं के बारह हजार वर्ष मिलाकर चार युग आते  है | सतयुग ,द्वापर,त्रेता  और कलयुग | ये चारों  युग मिलाकर एक चतुर्युग कहलाते है | इकहत्तर चतुर्युग मिलाकर एक मन्वन्तर होता है |ऐसे हजार चतुर्युग का ब्रह्मा का एक दिन होता है ,जिसे कल्प कहते है | उसके  बाद प्रलय होता है जिसे ब्रह्मा की रात्रि कहलाती है | जिसके बाद नई सृष्टि होती है | कल्प  के विषय में कहा जाता है कि यहभारतीय काल गणना  ी सबसे लंबी गणना है जिसे गिनीज बुक ऑफ़ रिकॉर्ड्स ने भी माना है ( यह जानकारी विकिपीडिया  और विष्णुपुराण से उदधृत है )ये पुस्तक  जिंदगी के विभिन्न पहलुओं का दर्शन कराती  है व् जिंदगी में एक नए रंग भी भरती  है ।  साथ ही विचार  चेतना और संवेदना को जागृत करने की क्षमता रखती है । ये १००% दिलों में जगह बनायेगी इसमें कोई शक नहीं है। हमारी यही शुभकामनाएं है ।यह पुस्तक के अंश निसंदेह सफलता की ओर अग्रसर होकर धर्म और ज्ञान के क्षेत्र में अपना परचम लहरायेगी| यही शुभकामनाएं है ।      श्रीकृष्णवचनामृतं में लेखक वीरेंद्र सिंह ने इसे बहुत ही  मनन के साथ सार के साथ इसे लिखा है | जिसे पढ़ते रहने का आकर्षण ज्ञान के संग पठनीयता की धारा में हम सबको जोड़ता ही चले जाता है | अद्धभुत लेखनीयता का इस पुस्तक में समावेश किया है |
समीक्षा :
पुस्तक का नाम: श्रीकृष्णवचनामृतम
लेखक: श्री. वीरेंद्र जी
सम्पादक - डॉ गोपाल कृष्ण भट्ट 'आकुल '
प्रकाशक : फ्रेंड्स हेल्पलाइन कोटा
48 ए शिवपुरा,बाबा रामदेव मंदिर के पास रावतभाटा रोड ,कोटा-324009 (राजस्थान )
पृष्ठ संख्या -180
प्राप्ति स्थान: जी - श्री वीरेंद्र सिंह 16 ,दुर्गापुर हाउस गली न 1 सरस्वती कॉलोनी बारा रोड, कोटा(राजस्थान )324001

समीक्षक -संजय वर्मा 'दृष्टि '125 बलिदानी भगतसिंह मार्ग ,मनावर जिला धार मप्र9893070756



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