आका के बोलने से पहले ही वह अपने आका के जूते,जो उसने अभी-अभी पालिस कर के चमकाए थे,ले आया और अपने आका को पहिनाने लगा।
आका गुर्राया-'ठीक से साफ़ नहीं किए!'
वह सोच में पड़ गया।जूते चमचमा रहे थे लेकिन आका से कुछ भी बोलना ठीक नहीं।उसने सोचा कि चलो एक बार फिर से साफ़ किए देता हूँ।
'लेकिन किस से साफ़ करूँ?' -अपने आप से पूछते हुए उसने अपना सिर खुजलाना चाहा और उसका हाथ अपने सिर की टोपी (जो उसकी पार्टी की टोपी थी)पर पहुँच गया। उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई।
ठाकुर दास 'सिद्ध'
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